जयपुर संपादकीय — 21 July 2026
घर से दुकान: गुलाबी शहर में नया ‘सेटबैक’!
संपादक की राय
गुलाबी नगरी की गलियों में एक नया “झटका” नियम आया है। अब घर को दुकान बनाना इतना आसान नहीं रहा। क्या खूब! एक शहर जो बरसों से अपनी ही धुन में अतिक्रमण और अव्यवस्था का राग अलाप रहा था, अचानक उसे ‘प्लानिंग’ की सुध आ गई?
कहा जाता है कि यह शहरी नियोजन और सुव्यवस्थित विकास के लिए है। तर्क वही घिसे-पिटे, ‘बढ़ते दबाव’ और ‘बेतरतीब विस्तार’ के। पर क्या सच में ऐसा है, या यह सिर्फ़ एक और नया जाल है, जहाँ हर कागज़, हर हस्ताक्षर पर एक नई कीमत तय होगी? क्या गुलाबी रंग अब सिर्फ़ “रिश्वत” के लिफाफों पर ही चढ़ेगा?
ज़रा सोचिए, उस छोटे व्यापारी का क्या, जिसने बरसों पहले अपने पुश्तैनी घर का निचला हिस्सा दुकान में बदला था, बिना किसी ‘सेटबैक’ के? या वह, जो अब अपने बुढ़ापे में दो पैसे कमाने के लिए घर में ही कोई छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहता है? क्या शहर की हर दीवार अब सरकार की अनुमति की मोहताज होगी? क्या जयपुर को सिर्फ़ बड़े-बड़े मॉल और फाइव-स्टार होटल ही चाहिए?
यह नियम सिर्फ़ कागज़ों पर एक नई लकीर नहीं है। यह सरकारी बाबुओं के लिए एक नया ‘खजाना’ खोलने जैसा है। ‘सेटबैक’ नियमों का जाल इतना उलझा हुआ होगा कि उसे सुलझाने के लिए अलग से ‘मार्गदर्शक’ पैदा होंगे, और हर मार्गदर्शक की अपनी ‘फीस’। यह विकास नहीं, ‘अटकाओ और कमाओ’ का नया अध्याय है।
जिस शहर में अनाधिकृत कॉलोनियाँ रातों-रात कट जाती हैं, जहाँ बड़े-बड़े अतिक्रमण सालों तक आँखें मूंद कर देखे जाते हैं, वहाँ अब रिहायशी इमारतों के व्यावसायिक उपयोग पर ‘नियमों की तलवार’ चलेगी। वाह रे न्याय! क्या यह सिर्फ़ दिखावा नहीं कि हम व्यवस्था सुधार रहे हैं, जबकि असल में हम सिर्फ़ छोटे लोगों के रास्ते में और कांटे बिछा रहे हैं?
यकीन मानिए, इस नियम का डंडा सिर्फ़ उन पर चलेगा, जिनके पास बचाने वाला कोई नहीं। जो पहुँच वाले हैं, जो सत्ता के गलियारों में ‘नमस्ते’ कर सकते हैं, उनके लिए यह नियम भी एक ‘छूट’ का रास्ता निकाल लेगा। बड़े बिल्डर और प्रभावी व्यवसायी कभी ‘सेटबैक’ में नहीं आते, आते हैं तो सिर्फ़ गरीब और मध्यम वर्ग के लोग।
तो क्या जयपुर अब सिर्फ़ कागज़ी नियमों का शहर बनकर रह जाएगा, जहाँ हर छोटे बदलाव के लिए सरकार की इजाज़त और उसकी कीमत चुकानी होगी? क्या ‘गुलाबी शहर’ की पहचान अब सिर्फ़ फाइलों में दबे, लाल-पीले होते नक्शों से होगी? या फिर, यह नया नियम सिर्फ़ एक और ‘खेल’ है, जिसका असली मक़सद कुछ और ही है, जो आम जनता की समझ से परे है?