जयपुर संपादकीय — 22 July 2026
जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल: किस विकास की कीमत?
संपादक की राय
जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल नाकों की बढ़ी हुई दरें, एक बार फिर हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करती हैं कि “विकास” की हमारी परिभाषा क्या है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है। क्या यह सिर्फ़ अंकगणित का खेल है, जहाँ सड़कों को बेहतर करने के नाम पर जेबें हल्की की जाती हैं, या इसके पीछे कोई गहरी विडंबना छिपी है?
आज फिर उन्हीं टोल नाकों पर वाहनों की कतारें लंबी होंगी, जहाँ हर गुजरता वाहनचालक अब पहले से ज़्यादा शुल्क देगा। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने अपनी ‘मजबूरी’ का हवाला देते हुए दरें बढ़ाई हैं, मानो राजमार्गों का रखरखाव कोई आकस्मिक खर्च हो, न कि सतत विकास का हिस्सा। क्या यह “सुविधा शुल्क” है, या नागरिकों के धैर्य की परीक्षा लेने का नया तरीक़ा?
गुलाबी नगर से देश की राजधानी का सफ़र अब सिर्फ़ दूरी का नहीं, बल्कि जेब पर पड़ने वाले बोझ का भी प्रतीक बन गया है। जिन ‘विश्वस्तरीय’ सड़कों के वादे किए गए थे, उनका हिसाब-किताब आज भी आम आदमी की समझ से परे है। सड़कों पर गड्ढे, टूटी रेलिंग और बेतरतीब आवागमन की तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर तैरती दिखती हैं, लेकिन टोल की रसीद पर दर्ज राशि कभी घटती नहीं।
यह अजीबोगरीब न्याय है कि ‘बेहतर कनेक्टिविटी’ का जश्न मनाने वाले ही इसके लिए सबसे भारी कीमत चुकाते हैं। विकास के नाम पर हर रोज़ एक नई ईंट रखी जाती है, और उसकी लागत का हिसाब-किताब सीधे जनता की जेब से होता है। क्या यह सुविधा देने के बजाय एक तरह का कर नहीं है, जो बिना किसी बहस या सहमति के थोप दिया जाता है?
सवाल उठता है कि इन दरों को तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? क्या इसमें जनता की राय का कोई मूल्य है? या यह सिर्फ़ अफ़सरशाही का एक अदृश्य हाथ है, जो अपनी सुविधानुसार बटन दबाकर लोगों के मासिक बजट में सेंध लगा देता है? जिस देश में हर छोटे-बड़े खर्च का हिसाब मांगा जाता है, वहाँ राजमार्गों के इस ‘महंगे विकास’ पर चुप्पी क्यों?
जयपुर, जो खुद को पर्यटन और व्यापार का केंद्र मानता है, उसके लिए यह रोज़मर्रा की हकीकत है। बाहर से आने वाले सैलानी और स्थानीय व्यापारी, सभी इस बढ़ी हुई कीमत को चुकाएंगे। क्या यह हमारे बढ़ते हुए शहर की छवि के अनुकूल है, या यह एक ऐसी अघोषित बाधा है जो आर्थिक गतिविधियों को धीमा करेगी?
यह सिर्फ़ टोल टैक्स की बात नहीं है। यह उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है, जहाँ विकास को एकतरफ़ा तरीक़े से परिभाषित किया जाता है — लाभ कुछ के लिए और बोझ सबके लिए। एक दिन हम सिर्फ़ यह गिनते रह जाएंगे कि हमें अपने ही शहर से बाहर निकलने और वापस आने के लिए कितनी जेब ढीली करनी पड़ी।