जयपुर संपादकीय — 25 July 2026
70 हज़ार करोड़ का सट्टा: यह शहर किसका है?
संपादक की राय
गुलाबी नगर में 70 हज़ार करोड़ रुपए का सट्टा? आँखें फटी की फटी रह जाती हैं ये आँकड़ा सुनकर। यह कौन सी अर्थव्यस्था है, जो खुलेआम हमारी नाक के नीचे पल रही थी और हमें ख़बर तक नहीं? क्या यह कोई समानांतर सरकार है, जिसकी अपनी डिजिटल सड़कें और अपने छिपे हुए बैंक हैं, और हमारी पुलिस, हमारी एजेंसियाँ अब तक सिर्फ़ तमाशा देख रही थीं?
750 फ़र्ज़ी कंपनियाँ, भुगतान के ऐसे रास्ते जहाँ से पैसा भूत की तरह आता-जाता रहा। हमें बताया जाता है कि हर छोटे से छोटे लेन-देन पर सरकार की पैनी नज़र है, हर पैनकार्ड, हर आधार नंबर खंगाला जाता है, लेकिन यहाँ तो हज़ारों करोड़ रुपए ऐसे हवा में उड़ रहे थे जैसे पतंग की डोर ही न हो। क्या हमारे चौकीदार इतनी गहरी नींद में थे कि ये पूरा बाज़ार उनके सपनों में भी नहीं दिखा?
और फिर आता है 19,600 करोड़ रुपए की जीएसटी चोरी का आंकड़ा। यह सिर्फ़ कागज़ों पर लिखी एक संख्या नहीं है। यह उन सड़कों का पैसा है जो कभी बनी नहीं, उन अस्पतालों का बजट है जहाँ आज भी मरीज़ ज़मीन पर लेटे हैं, उन स्कूलों की फीस है जो बच्चों से जबरन वसूली जाती है। यह हमारी जेब से निकला वो पैसा है जो कुछ लोगों ने अपने खेल में उड़ा दिया और व्यवस्था मुस्कुराती रही।
बात सिर्फ़ सट्टे की नहीं है। बात उस ‘फ़िनटेक नेटवर्क’ की है, जो ‘डम्मी फर्मों’ के जाल से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेता है। यह दिखाता है कि इस शहर की, इस प्रदेश की वित्तीय धमनियों में कौन सी गंदगी बह रही है। कौन से बड़े खिलाड़ी हैं, जिनकी शह पर यह सब खेल चल रहा था? क्या ये ‘शेल मर्चेंट’ सिर्फ़ मोहरे हैं, या पूरी बिसात ही इनकी है?
पुलिस की जाँच चौड़ी हो रही है, अख़बारों में सुर्ख़ियाँ बन रही हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, इतने बड़े पैमाने पर यह खेल कितने समय से चल रहा होगा? क्या यह रातों-रात हुआ? या यह हमारे समाज में, हमारी व्यवस्था में एक कैंसर की तरह धीरे-धीरे फैल रहा था, और हमने तब तक आँखें मूंदे रखीं, जब तक यह एक विशालकाय दानव नहीं बन गया?
ये तो वही बात हुई कि घर में डाका पड़ा, और चोरों के जाने के बाद हमने दरवाज़े मज़बूत करने की बात शुरू की। असली सवाल यह नहीं है कि जाँच कितनी चौड़ी होगी, बल्कि यह है कि इस ‘चौड़े’ नेटवर्क को बनने ही क्यों दिया गया? कौन से अफ़सर, कौन से नेता इस खेल पर अपनी आँखें बंद रखे थे, या शायद उनसे ज़्यादा कुछ कर ही नहीं सकते थे?
इस ‘डिजिटल इंडिया’ में, जहाँ हर डेटा पर नज़र रखने का दावा है, वहाँ 70 हज़ार करोड़ रुपए का काला धन, एक समानांतर ‘ई-कॉमर्स’ की तरह चलता रहा। यह सिर्फ़ एक घोटाला नहीं, यह हमारे शासन की, हमारे कानून के राज की, और हमारे नैतिक ताने-बाने की खुली चुनौती है। इस शहर में, इस प्रदेश में, क्या वाकई कोई बचा है जो इन सट्टेबाज़ों की मर्ज़ी के बिना साँस ले सके?