जयपुर संपादकीय — 28 July 2026
एक जाम, एक जान और एक यू-ट्यूब का सबक
संपादक की राय
गुलाबी नगर में अब रिश्तों की कीमत एक शराब के बिल से भी कम हो गई है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, यह जयपुर की ताज़ा हकीकत है, जहां दोस्त ने दोस्त को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया क्योंकि दारू का बिल चुकाने की नौबत आ गई थी। और फिर, इस घिनौने कृत्य को अंजाम देने के बाद, बचने का तरीका खोजने के लिए गूगल नहीं, सीधे यू-ट्यूब का सहारा लिया गया। वाह रे इक्कीसवीं सदी की अज्ञानता और अपराधबोध!
क्या वाकई इंसान की जान इतनी सस्ती हो गई है कि कुछ रुपयों के लिए किसी का गला घोंट दिया जाए? वह भी किसी ऐसे का, जिसे आप ‘दोस्त’ कहते हैं, जिसके साथ बैठकर आपने शराब साझा की। यह सिर्फ एक हत्या नहीं, यह समाज के उस सड़े हुए हिस्से का नग्न प्रदर्शन है जहाँ मानवीय मूल्य बोतल के ढक्कन से भी कमज़ोर पड़ गए हैं।
यूट्यूब पर अपराध से बचने के नुस्खे ढूँढना — यह आधुनिक मूर्खता की पराकाष्ठा है। जिस पीढ़ी के हाथ में दुनिया भर का ज्ञान है, वह उसे अपराध की ट्रेनिंग मैनुअल में बदल रही है। क्या वाकई इन तथाकथित ‘अपराधियों’ को लगा कि अपराधबोध को छिपाने के लिए कोई वीडियो ट्यूटोरियल मिल जाएगा? क्या यही है डिजिटल इंडिया का सपना, जहाँ ज्ञान का उपयोग पुलिस से बचने के तरीकों में हो?
यह सिर्फ उन दो हत्यारों की कहानी नहीं, यह उस पूरी मानसिकता का आईना है जो त्वरित संतुष्टि और बिना परिणाम की दुनिया में जी रही है। जहां एक मामूली विवाद सुलझाने की बजाय, हिंसा को सबसे आसान रास्ता मान लिया जाता है। जहां ‘दोस्ती’ जैसा पवित्र शब्द भी चंद घूंट शराब के सामने बेमानी हो जाता है।
एक समय था जब जयपुर अपनी मेहमाननवाज़ी और जिंदादिली के लिए जाना जाता था। आज यह शहर उन खबरों से रंगा है, जहां एक होटल का कमरा दोस्ती के खून से लथपथ है और उसके हत्यारे ‘स्मार्ट’ बनने की कोशिश में सोशल मीडिया खंगाल रहे हैं। यह बताता है कि हम भीतर से कितने खोखले हो चुके हैं।
कानून अपना काम करेगा, पुलिस दोषियों को पकड़ेगी, अदालत सजा सुनाएगी। लेकिन यह सवाल अनुत्तरित ही रहेगा कि आखिर समाज में यह गिरावट क्यों आ रही है? क्या शराब सिर्फ दिमाग पर चढ़ रही है या हमारे संस्कारों को भी लील रही है?
गुलाबी शहर की यह स्याह सच्चाई, हमें बार-बार यह सोचने पर मजबूर करती है कि इस चमक-दमक के पीछे कैसी अंधेरी गलियां पनप रही हैं। ऐसी गलियां, जहाँ दोस्ती की लाश पर, अपराध की पाठशाला यू-ट्यूब पर चलती है। क्या वाकई हम इतने बेख़बर हैं कि इस सब पर सिर्फ ठंडी आह भरकर रह जाएंगे?