जयपुर संपादकीय — 29 July 2026
रीट: शिक्षा के बाजार में सरेआम नीलाम होती तकदीरें
संपादक की राय
किसी भी परीक्षा का पेपर लीक होना सिर्फ़ कुछ पन्नों का बाहर आ जाना नहीं होता, यह लाखों सपनों का, वर्षों की तपस्या का, और उस भरोसे का सरेआम गला घोंटना है जो एक युवा को अपने मुल्क की व्यवस्था पर होता है। रीट-21 के लीकेज की बात आज फिर उठी है, और सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ़ एक चूक थी, या शिक्षा के बाज़ार में तयशुदा सौदा?
गुलाबी नगर की गलियों में यह खेल नया नहीं। पहले भी हो चुका है, और अगली परीक्षा का पर्चा कब, कहाँ से, और कितने में बिकेगा, शायद इसकी तैयारी भी भीतर ही भीतर चल रही होगी। एक तरफ़ कड़ी मेहनत से रात-दिन एक करने वाले बच्चे, दूसरी तरफ़ चंद रुपयों के लिए उनका भविष्य बेचने को तैयार बैठे अदृश्य हाथ।
अब ख़बर है कि सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने सीधे गृह मंत्री शाह को चिट्ठी लिखी है, राज्य सरकार को दरकिनार करते हुए। यह सिर्फ़ न्याय की गुहार है, या सत्ता के गलियारों में बिछाई जा रही एक नई बिसात? भाजपा के ही कुछ ‘अंदरूनी’ लोग इससे खफ़ा हैं, यानी पर्दे के पीछे का खेल सिर्फ़ पर्चा लीक करने वालों तक सीमित नहीं, यह राजनीति के धड़ेबाज़ी का भी अखाड़ा बन चुका है।
यह कैसा तंत्र है, जहाँ परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने की ज़िम्मेदारी जिन पर है, वही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी साबित होते हैं? हर बार जाँच का आश्वासन मिलता है, कुछ बलि के बकरे भी पेश किए जाते हैं, पर मुख्य सरगना कौन हैं, उनका नेटवर्क कितना गहरा है, यह रहस्य कभी खुलता नहीं। या शायद जानबूझकर खोला नहीं जाता।
एक अदद सरकारी नौकरी की उम्मीद में गाँव-देहात के कितने ही परिवार अपनी ज़मीन गिरवी रख देते हैं, माँ-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं। उनके लिए यह सिर्फ़ एक इम्तिहान नहीं, पीढ़ियों का सुधारने वाला मौका होता है। और वह मौका, चंद बेईमान हाथों की मुट्ठी में बंद होकर रिस जाता है।
रीट-21 का यह मसला सिर्फ़ अतीत का दाग़ नहीं, यह वर्तमान की एक टीस है जो लाखों युवाओं के मन में घर कर गई है। यह उनके आत्मविश्वास पर सीधा वार है, उन्हें यह बताने का कि तुम्हारा परिश्रम मायने नहीं रखता, मायने रखता है ‘पहुँच’ और ‘पैसा’। क्या हम सचमुच ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जिसे भरोसा हो कि भारत में ‘मेरिट’ नाम की कोई चीज़ अब सिर्फ़ किताबों में मिलती है?
अगली बार जब कोई सरकार ‘युवाओं के भविष्य’ की बात करे, तो क्या हम उस पर आँख मूँद कर विश्वास कर पाएंगे? या हर वादे के पीछे हमें एक फटा हुआ प्रश्न पत्र और उसके साथ बिखरे हुए सपनों की आह सुनाई देगी? यह सवाल आज भी जयपुर के हर चौराहे पर खड़ा है, जवाब किसी के पास नहीं।