जयपुर संपादकीय — 30 July 2026
पुलिस अकादमी: खाकी के भीतर हैवानियत
संपादक की राय
राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, जहाँ खाकी की इज़्ज़त का पाठ पढ़ाया जाता है, अब वहीं से बलात्कार और हत्या के प्रयास जैसे आरोपों की गूँज सुनाई दे रही है। यह कैसी विडंबना है कि जिन कंधों पर कानून और व्यवस्था की रक्षा का भार आने वाला है, वे ही कंधे अब एक सहकर्मी की अस्मत और जान के दुश्मन बन बैठे हैं। क्या इस देश में कोई जगह बची है, जिसे हम पवित्र कह सकें?
शुरुआत हुई थी यौन उत्पीड़न के आरोपों से, जो कि अपने आप में कम शर्मनाक नहीं थे। लेकिन जैसे-जैसे परतें उतरीं, जुर्म का चेहरा और भयावह होता गया। अब एक प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी पर बलात्कार और हत्या के प्रयास के संगीन आरोप लगे हैं – गला घोंटने के निशान, हथियार का इस्तेमाल, और मानसिक प्रताड़ना के शब्द। यह सिर्फ एक घटना नहीं, यह उस पूरी व्यवस्था पर एक क्रूर व्यंग्य है, जो समाज में सुरक्षा और न्याय का ढोंग रचती है।
आजकल हर दीवार पर ‘नारी शक्ति’ और ‘महिलाओं की सुरक्षा’ के खोखले नारे लिखे मिलते हैं। लेकिन जब सुरक्षा का पाठ पढ़ने वाले खुद ही भेड़िए बन जाएँ, तो आम औरत किस पर भरोसा करे? पुलिस अकादमी, जहाँ अनुशासन और नैतिकता की पहली सीढ़ी चढ़ाई जाती है, अगर वहाँ भी एक महिला प्रशिक्षु सुरक्षित नहीं, तो गलियों में, घरों में, दफ्तरों में क्या उम्मीद की जाए?
यह सिर्फ एक ‘बिगड़ैल’ अधिकारी की कहानी नहीं है। यह उस मानसिकता का आइना है, जो सत्ता और वर्दी की हनक में चूर होकर किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहती है। ग्यारह दिन लगे गिरफ्तारी में — क्या यह बताता है कि भीतर ही भीतर कितनी पर्तें बचाने की कोशिश की जा रही होंगी? क्या खाकी का गौरव इतना कीमती है कि उसके दाग़ छुपाने के लिए किसी महिला की चीख को अनसुना कर दिया जाए?
जब अपराध करने वाला व्यक्ति कानून का रक्षक बनने वाला हो, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि ऐसे “रक्षक” सड़कों पर उतरेंगे तो कैसा न्याय देंगे? क्या ऐसे लोग जनता के लिए न्याय के प्रतीक बन पाएंगे या सत्ता का दुरुपयोग कर आम जनता के लिए भी भय का दूसरा नाम बन जाएंगे? शायद यह अब सोचना भी बेमानी हो गया है।
जो ‘सेवा, सुरक्षा, सहयोग’ का मंत्र हमें सिखाया जाता है, वह आज राष्ट्रीय पुलिस अकादमी के गलियारों में दम तोड़ता दिख रहा है। यह सिर्फ एक घटना नहीं, यह एक चेतावनी है। एक ऐसी चेतावनी, जो हमें बताती है कि अगर हम अपनी संस्थाओं को भीतर से साफ़ नहीं करेंगे, तो यह सड़ांध पूरे समाज को निगल जाएगी।