जयपुर संपादकीय

गुलाबी नगर में मौत का सार्वजनिक मंच

संपादक की राय

जयपुर की सड़कें अब सिर्फ़ आवाजाही के लिए नहीं, बल्कि मौत का नंगा नाच देखने के लिए भी मशहूर हो रही हैं। एक मामूली सी बात पर, खुलेआम, एक इंसान को पीट-पीटकर मार डाला गया। क्या यही है हमारा गुलाबी शहर, जहाँ अब खून का रंग भी गुलाबी लगने लगा है?

बात सिर्फ़ इतनी थी कि किसी ने ज़रा सी असहमति दिखाई। कुछेक पल का विवाद, और फिर भीड़ का बर्बर चेहरा सामने आ गया। क्या जीवन इतना सस्ता हो गया है कि एक क्षणिक ग़लतफ़हमी की क़ीमत जान देकर चुकानी पड़े, और वह भी किसी सार्वजनिक स्थल पर, जहाँ ‘सभ्य’ लोग आवाजाही करते हैं?

और यह सब खुलेआम हुआ! सड़कों पर भीड़ थी, आँखें थी, शायद मोबाइल कैमरे भी। लेकिन किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया, किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। क्या हम तमाशबीन बनने के इतने आदी हो गए हैं कि सामने किसी की जान जा रही हो, तब भी हमारी मानवता पर पर्दा पड़ा रहे? पुलिस का डर कहाँ गया? या अब डर सिर्फ़ कमज़ोरों को लगता है?

हम बात करते हैं जयपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की, विश्वस्तरीय पर्यटन हब बनाने की। गुलाबी दीवारों के पीछे की यह कड़वी सच्चाई कौन देखेगा? क्या हमारी चमकती सड़कें और भव्य विरासत सिर्फ़ आँखों को धोखा देने के लिए हैं, जबकि इनके नीचे बर्बरता की काली धारा बहती है, जहाँ मनुष्यता दम तोड़ रही है?

अगले दिन वही पुरानी रटी-रटाई पंक्तियाँ दोहराई जाएँगी। ‘दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा’, ‘कड़ी कार्रवाई होगी’। पर कब तक? हर बार एक नई घटना, एक नया बयान, और फिर सब कुछ पहले जैसा। क्या हमारी व्यवस्था सिर्फ़ कागज़ों पर ज़िंदा है, या अब वह भी सिर्फ़ रस्मी बयानबाज़ी का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें असल काम की कोई जगह नहीं?

यह सिर्फ़ क़ानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह हमारी सामूहिक आत्मा पर लगा दाग़ है। जिस समाज में मामूली बात पर लोग एक-दूसरे की जान लेने को आमादा हों, और बाक़ी लोग मूकदर्शक बने रहें, उस समाज का भविष्य क्या होगा? क्या हम सचमुच इतने बेदर्द हो गए हैं कि इंसानी ज़िंदगी की कोई क़ीमत ही नहीं बची?

कल किसी और चौराहे पर, किसी और मामूली बात पर, कोई और ज़िंदगी बुझ जाएगी। और हम फिर अगले दिन की ख़बरों का इंतज़ार करेंगे, शायद चाय की चुस्कियों के साथ उस पर भी दो मिनट बात करेंगे। क्या हम इतनी बेफ़िक्र ज़िंदगी के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि मौत भी अब हमें चौंकाती नहीं, बस एक और ख़बर बनकर रह जाती है?