जयपुर संपादकीय

भीलवाड़ा: जननी नहीं, सिर्फ़ आंकड़ा

संपादक की राय

जयपुर की सुबह अक्सर गुलाबी होती है, लेकिन भीलवाड़ा से आती ख़बरें उसे स्याह कर देती हैं। महात्मा गांधी अस्पताल, नाम सुनकर लगता है कि यहाँ सेवा और समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता होगा। मगर हकीकत यह है कि उसी अस्पताल में दो और माताओं ने प्रसव के बाद दम तोड़ दिया। यह महज़ दो मौतें नहीं, हमारे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की आत्मा पर लगे सातवें दाग़ हैं, क्योंकि इसी सुविधा केंद्र में पहले भी पांच माताएं काल के गाल में समा चुकी हैं।

ज़रा सोचिए, एक माँ जो अपनी कोख में एक नए जीवन को संजोए आती है, उसे उम्मीद होती है कि यहाँ उसे सुरक्षा मिलेगी, देखभाल मिलेगी। लेकिन उसे मिलता क्या है? अत्यधिक रक्तस्राव, प्रसवोत्तर रक्तस्राव और दौरे। ये कोई असाध्य रोग नहीं, ये वो सामान्य जटिलताएं हैं जिनका सामना करने के लिए हर अस्पताल को तैयार रहना चाहिए। जब एक महिला को सेटेलाइट अस्पताल से रेफर किया जाता है, तो यह माना जाता है कि बड़े अस्पताल में बेहतर सुविधाएँ मिलेंगी। क्या भीलवाड़ा में ‘बेहतर’ का मतलब सिर्फ़ मौत की तारीख़ आगे बढ़ाना है?

सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अक्सर बड़े-बड़े आयोजनों में व्यस्त रहते हैं। जयपुर में कभी शांति सम्मेलन हो रहा है, कभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले किसान मंचों का उद्घाटन। लेकिन क्या किसी के पास इतना समय है कि वह भीलवाड़ा के उस सरकारी अस्पताल की बदहाली पर ध्यान दे जहाँ जिंदगियाँ लील ली जा रही हैं? विकास के दावे हवा-हवाई लगते हैं जब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ दम तोड़ रही हों।

यह कैसा विडंबनापूर्ण समाज है, जहाँ हम अपनी संस्कृति में माँ को देवी का दर्जा देते हैं, और फिर उन्हीं माताओं को सरकारी अस्पताल की लापरवाही के चलते असमय मरने देते हैं। बच्चे अपनी माँ के बिना इस दुनिया में आते ही अनाथ हो जाते हैं। इन नवजात शिशुओं की किलकारियाँ अब कभी अपनी माँ की लोरी नहीं सुन पाएंगी। क्या यही हमारा नया भारत है?

इस पूरे प्रकरण में सबसे असहज करने वाला तथ्य यह है कि यह मौतें कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं हैं। इसी अस्पताल में, इसी तरह की परिस्थितियों में, पहले भी पांच और माताएं अपनी जान गँवा चुकी हैं। क्या कोई जांच हुई? क्या किसी को जवाबदेह ठहराया गया? या फिर हर बार एक नया मामला, एक नया बयान, और फिर वही पुरानी लीपापोती? यह तो किसी क्रोनिक बीमारी से ग्रस्त व्यवस्था का लक्षण है, जहाँ इलाज के नाम पर सिर्फ़ मरहम पट्टी की जाती है, और फिर घाव सड़ते रहते हैं।

जब भी कोई ऐसी घटना होती है, कुछ दिनों तक शोर मचता है। अख़बारों में सुर्खियाँ बनती हैं, टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं। फिर सब कुछ शांत हो जाता है। अगली बार तक, जब तक फिर कोई माँ मौत की दहलीज पार न कर ले। क्या सरकारी अस्पतालों में एक माँ की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई है कि वह सिर्फ़ एक आंकड़े बनकर रह जाए? क्या हमारी संवेदनशीलता वाकई इतनी गहरी नींद में सो चुकी है कि अब उसे जगाने के लिए कोई अलार्म ही नहीं बचा?