जयपुर संपादकीय

दिल्ली-जयपुर: अब बाधा-मुक्त वसूली

संपादक की राय

आज दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर टोल प्लाज़ा से “बाधा-मुक्त” टोलिंग की शुरुआत हुई है। एक पल को लगा कि शायद हमने समय को जीत लिया, या तंत्र ने आखिरकार अपनी अकर्मण्यता पर विजय पा ली। मगर फिर वही पुराना सवाल कौंधा – क्या सचमुच कोई बाधा हटी है, या बस उसका रूप बदल गया है? टोल की भौतिक बाधा तो हट गई, मगर क्या उन अदृश्य बाधाओं का क्या जो दशकों से इस गुलाबी शहर और राजधानी के बीच की दूरी को सिर्फ़ किलोमीटर में नहीं, बल्कि खीझ और परेशानी में नापती हैं?

यह कितनी विचित्र विडंबना है कि जिस सड़क पर गड्ढे, बेतरतीब मोड़ और अचानक उग आने वाले अतिक्रमण रोज़ का झगड़ा हैं, वहाँ अब “बाधा-मुक्त” वसूली का डंका पीटा जा रहा है। सरकारें आती हैं, जाती हैं, सड़कों के नाम बदलते हैं, टोल के तरीके बदलते हैं, पर सड़क यात्रा का कड़वा सच नहीं बदलता। क्या यह ‘बाधा-मुक्त’ सिर्फ़ जेब से पैसा निकालने की प्रक्रिया को तेज़ करने का एक नया तरीक़ा नहीं है?

‘तेज़ आवागमन’ के नाम पर हमें दशकों से क्या परोसा गया है, यह जयपुर से दिल्ली का सफ़र करने वाला हर व्यक्ति बखूबी जानता है। आधा अधूरा चौड़ीकरण, बिना किसी योजना के बनने वाले सर्विस रोड, और फिर उन पर बेख़ौफ़ दौड़ते ओवरलोड ट्रक – ये सब किसी टोल नाके की भौतिक बाधा से कहीं ज़्यादा बड़ी रुकावटें हैं। इनकी गिनती कौन करेगा? इन्हें कौन हटाएगा?

अफ़सरशाही की मेज़ पर शायद यह एक बड़ा नवाचार होगा। आंकड़ों में इसे ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ का हिस्सा भी बताया जाएगा, या शायद ‘डिजिटल इंडिया’ का एक और सुनहरा उदाहरण। मगर ज़मीन पर, जहाँ आम आदमी अपनी गाड़ी का पेट्रोल फूँकते हुए घंटों जाम में फँसता है, वहाँ इस ‘बाधा-मुक्त’ प्रणाली का क्या अर्थ है? क्या यह सिर्फ़ एक नया चोंचला नहीं है जो मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए रचा गया है?

गुलाबी नगर के बाशिंदे जानते हैं कि विकास की परिभाषा यहाँ अक्सर ऊपरी चमक-दमक तक ही सीमित रहती है। अंदरूनी सड़ांध वैसी ही बनी रहती है। टोल प्लाज़ा पर गाड़ियाँ भले ही रुकना बंद कर दें, पर हाईवे पर मौत के आँकड़े या हादसों की संख्या पर क्या इसका कोई असर पड़ेगा? सुरक्षा, रखरखाव और सुविधा – ये अब भी दूर की कौड़ी लगते हैं, जबकि ‘वसूली’ के तरीके हर दिन आधुनिक होते जा रहे हैं।

तो क्या अब हमें इस बात पर खुश होना चाहिए कि हमारी जेब से पैसा निकालने की प्रक्रिया अब ज़्यादा ‘स्मूथ’ हो गई है? कि टोल बूथ पर लगने वाला हमारा कीमती समय अब ‘बच’ जाएगा, सिर्फ़ इसलिए कि आगे जाकर हम किसी और बेतरतीब मोड़ या अधूरी सड़क परियोजना के जाम में फँसें? यह सिर्फ़ एक नई बोतल में पुरानी शराब है, जिसका स्वाद आज भी उतना ही कसैला है।

शायद इस ‘बाधा-मुक्त’ टोलिंग का सीधा सा मतलब यह है कि अब हमें शिकायत करने का एक नया बहाना मिलेगा। पहले हम टोल पर रुकने की शिकायत करते थे, अब शायद हम इस ‘अदृश्य’ टोल की पारदर्शिता पर सवाल उठाएँगे। पर क्या किसी के पास इन सवालों का जवाब होगा? या यह भी एक ऐसी बाधा है, जिसे कोई हटाना नहीं चाहता?