जयपुर संपादकीय — 3 August 2026
गुलाबी नगरी की छठी ख़ुशी या छठा मज़ाक
संपादक की राय
जयपुर, विश्व के ‘खुशहाल शहरों’ की सूची में छठे पायदान पर! ख़बर पढ़कर लगा, क्या हम उसी जयपुर में साँस ले रहे हैं, जहाँ कल भी पानी की किल्लत थी और आज भी सड़कों पर गड्ढे? या यह कोई समानांतर ब्रह्मांड है, जहाँ गुलाबी नगर की परिभाषा ही बदल चुकी है?
सुबह दफ़्तर जाने की जद्दोजहद, शाम को बाज़ार की अराजकता, और हर दूसरे मोड़ पर धूल-धक्कड़ का साम्राज्य – क्या यही है वह ‘खुशी’ जो हमें वैश्विक सूचकांकों में मिली है? शायद खुशी की परिभाषा बदल गई है। अब वह शोर-शराबे, ट्रैफिक जाम और सरकारी फ़ाइलों में दबी उम्मीदों के बीच भी मुस्कुराना सीख गई है।
पता नहीं कौन से विशेषज्ञ किस वातानुकूलित दफ़्तर में बैठकर हमारे शहर की ‘खुशी’ का पैमाना तय करते हैं। क्या वे कभी पुरानी बस्तियों की तंग गलियों से गुज़रे हैं, जहाँ एक छत के नीचे चार परिवार भविष्य की चिंता में डूबे हैं? या उनका सर्वेक्षण केवल उन्हीं एलीट क्लबों तक सीमित था, जहाँ गुलाबी चश्मे से दुनिया देखना एक रस्म है?
यह आंकड़ा शायद सत्ता के गलियारों में बैठे उन महाशयों के लिए एक नया ‘तमाशा’ होगा, जिसे दिखाकर वे अपनी पीठ थपथपा सकें। विकास के खोखले नारों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को भरने की बजाय, ऐसे ‘खुशहाली इंडेक्स’ एक सुंदर पर्दा बन जाते हैं। समस्याएँ वहीं की वहीं हैं, बस उन्हें देखने का नज़रिए काग़ज़ों पर बदल गया है।
और हम? हम भी तो इस ‘खुशी’ में बराबर के भागीदार हैं। हमने शोर को संगीत, असुविधा को आदत और भ्रष्टाचार को परंपरा मान लिया है। शायद हमारी ‘खुशी’ इसी स्वीकार्यता में छिपी है – कि अब बदलाव की उम्मीद ही छोड़ दी जाए। यह गुलाबी नगर की वह दोहरी ज़िंदगी है, जहाँ बाहर से सब चंगा दिखता है, भीतर कितनी घुटन है, यह कोई नहीं पूछता।
कभी यह शहर अपनी शांत गलियों, अपनी ऐतिहासिक विरासत और अपने ठहराव के लिए जाना जाता था। आज इसकी पहचान बेतरतीब निर्माण, हरियाली की कमी और एक बेतहाशा दौड़ बन गई है। क्या हम सचमुच खुश हैं, या हमने सिर्फ़ खुशी का दिखावा करना सीख लिया है, ठीक वैसे ही जैसे इस शहर ने अपनी आत्मा को आधुनिकता की वेदी पर चढ़ा दिया है?
जब आंकड़े ज़मीनी हकीकत से इतने दूर हों, तो सवाल यह नहीं कि हम खुश हैं या नहीं, बल्कि यह कि हम कब तक इस भ्रम में जीते रहेंगे? यह ‘खुशी’ कहीं एक सामूहिक मानसिक दिवालियापन तो नहीं, जहाँ समस्याओं को अनदेखा करना ही जीवन का मूल मंत्र बन गया है? कहीं ऐसा न हो कि यह ‘छठी रैंकिंग’ हमें छठे पाताल में ले जाए, जहाँ जागने के लिए कोई अलार्म न बजे।