जयपुर संपादकीय — 4 August 2026
जयपुर: सेनाओं का रोज़मर्रा का रण
संपादक की राय
आज गुलाबी नगर की सड़कों पर फिर एक अजीबोगरीब मंज़र था। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के ख़िलाफ़ एक ‘सेना’ मैदान में थी, हाथ में झंडे, ज़ुबान पर नारे और इरादों में पुलिस से भिड़ने की पुरानी धुन। क्या यह हमारा नया ‘नॉर्मल’ है, जहाँ हर नियम, हर फ़ैसले का स्वागत सड़कों पर लाठियों और चीख़-पुकार से होता है?
यह कैसी ‘सेना’ है जो सरहदों पर नहीं, बल्कि जयपुर की सड़कों पर अपने ही लोगों और अपनी ही व्यवस्था से हर चौथे दिन ‘युद्ध’ करती है? क्या सचमुच इन्हें UGC के नियमों की पेचीदगियां इतनी गहरी समझ आती हैं कि उसके ख़िलाफ़ पुलिस से सीधा टकराव मोल लेने को तैयार हो जाते हैं? या यह सिर्फ़ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का एक और सुनियोजित अभ्यास है, जिसका अंत हमेशा मुख्यमंत्री आवास के घेराव की खोखली धमकी पर होता है?
जयपुर, जो कभी अपनी मेहमानवाज़ी और शाही अंदाज़ के लिए जाना जाता था, आज प्रदर्शनों का स्थायी मंच बन चुका है। हर गली-कूचा, हर चौराहा किसी न किसी दल, किसी न किसी समूह, किसी न किसी ‘सेना’ का रणक्षेत्र बन जाता है। पटकथा पुरानी, संवाद घिसे-पिटे, और परिणाम हमेशा वही — दिन भर की सुर्खियाँ और आम नागरिक के लिए घंटों की परेशानी।
और हमारी व्यवस्था? उसकी प्रतिक्रिया भी बरसों से तयशुदा है। पहले विरोध को रोकने की कोशिश, फिर हल्का-फुल्का बल प्रयोग, फिर कुछ नेताओं से बात और आख़िर में किसी ‘आश्वासन’ का जुमला। यह एक अजीबोगरीब नृत्य है, जिसमें कोई हारता नहीं, कोई जीतता नहीं, बस शहर की साँसें थोड़ी देर के लिए थम जाती हैं।
सवाल यह नहीं कि UGC के नियम सही हैं या ग़लत। सवाल यह है कि क्या हर असहमति, हर मतभेद का इज़हार अब सिर्फ़ पुलिस से भिड़ने और शहर को बंधक बनाने से होकर ही गुज़रेगा? क्या संवाद के सारे दरवाज़े बंद हो चुके हैं? क्या हमारे लोकतंत्र में विरोध जताने का कोई सभ्य तरीक़ा बचा ही नहीं है?
इन ‘सेनाओं’ का मक़सद क्या है? क्या ये किसी बड़े आदर्श के लिए लड़ती हैं, या सिर्फ़ कुछेक चेहरों को सियासत की सीढ़ी पर एक पायदान ऊपर चढ़ाने का यह सबसे आसान ज़रिया है? कल तक जो भीड़ में गुमनाम थे, आज सड़कों पर हंगामा कर ‘नेता’ बन जाते हैं। यह कैसी राजनीति है जहाँ भीड़ जुटाना ही सबसे बड़ी योग्यता बन गई है?
गुलाबी शहर की पहचान अब सिर्फ़ अपने महलों, बाज़ारों और पर्यटन से नहीं, बल्कि इन रोज़मर्रा के ‘विरोधों’ और ‘लड़ाईयों’ से भी है। अगली ‘सेना’ किस मोर्चे पर, किस नियम के ख़िलाफ़ कब उतरेगी, बस इसी का इंतज़ार है। क्या इस शोर में किसी को वास्तविक समस्याओं की फुसफुसाहट सुनाई भी देती है, या हमने जानबूझकर अपने कान बंद कर लिए हैं?