जयपुर संपादकीय — 5 August 2026
अस्पताल: सेवा का मुखौटा?
संपादक की राय
गुलाबी नगर के चौराहों पर लगे कैमरे क्या सिर्फ़ चालान काटने के लिए हैं, या उन्हें कभी उन अदृश्य कोनों में भी झाँकना चाहिए जहाँ इंसानियत दम तोड़ रही होती है? शहर के एक अस्पताल में, जहाँ उम्मीद और जीवन की तलाश में लोग आते हैं, वहीं एक किशोर मरीज़ से यौन उत्पीड़न की ख़बर एक बार फिर हमें शर्मसार करती है। यह घटना सिर्फ़ एक अटेंडेंट की घिनौनी करतूत नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर कालिख है जो चंद रुपयों के लिए किसी भी भेड़िये को सफ़ेद वर्दी पहनाकर मासूमों के पास पहुँचने देती है।
अस्पताल, जो कभी जीवन और सुरक्षा का पर्याय होते थे, अब ऐसी ख़बरों से थर्रा रहे हैं। क्या हमने अपनी नैतिक दिशा ऐसी गँवा दी है कि अब इन संस्थानों में भी हर मरीज़ को, ख़ासकर किशोरों और महिलाओं को, हर पल चौकन्ना रहना होगा? जिस जगह दर्द से कराहते लोग आराम और राहत की तलाश में होते हैं, वहाँ उनके भरोसे का गला घोंटा जाए — यह कौन सा समाज गढ़ रहे हैं हम?
क्या ये अटेंडेंट कोई मंगल ग्रह से उतर कर आते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि की जाँच ज़रूरी नहीं? या फिर यह हमारी व्यवस्था का ढीलापन है जो इतनी बड़ी चूक को ‘एक आदमी की गलती’ कहकर पल्ला झाड़ लेता है? नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत यहाँ अक्षरशः चरितार्थ होती दिखती है, जहाँ बड़े-बड़े भवनों के भीतर नैतिकता का दीया बुझ चुका है।
सरकारें ‘ई-गवर्नेंस’ और ‘स्मार्ट सिटी’ का डंका पीटती हैं। जयपुर में ई-गवर्नेंस पर बड़े-बड़े सम्मेलन होते हैं, जहाँ एआई और नागरिक सेवाओं पर ज्ञान बघारा जाता है। पर क्या कोई ‘एआई’ या ‘स्मार्ट सिस्टम’ इस बात की गारंटी दे सकता है कि हमारे अस्पताल सुरक्षित हैं? या फिर ये सारी भव्य घोषणाएँ सिर्फ़ काग़ज़ी घोड़े हैं जो ज़मीनी हकीकत की धूल में कहीं खो जाते हैं?
और सवाल सिर्फ़ उस अटेंडेंट पर ही क्यों रुके? अस्पताल प्रशासन की क्या ज़िम्मेदारी थी? क्या उसकी भर्ती प्रक्रिया में कहीं कोई चूक नहीं थी? क्या उसकी गतिविधियों पर कभी कोई नज़र नहीं रखी गई? या फिर यह माना जाता है कि एक बार नौकरी दे दी तो सारे पाप धुल गए और वह व्यक्ति अब संत हो गया? यह उदासीनता ही ऐसे अपराधों की असली जड़ है।
यह केवल एक घटना नहीं है; यह एक चेतावनी है। एक बीमार समाज की चेतावनी, जहाँ सुरक्षा और सेवा के नाम पर घात लगाने वाले हर जगह मौजूद हैं। जब इलाज करवाने आया एक बच्चा भी सुरक्षित न हो, तो फिर भरोसा किस पर करें? यह सिर्फ़ उस किशोर के साथ अन्याय नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के विश्वास का हनन है जो किसी मजबूरी में अस्पताल का दरवाज़ा खटखटाता है।
गुलाबी शहर की यह दोहरी ज़िंदगी कितनी कड़वी है। एक तरफ़ चकाचौंध, विकास के दावे, पर्यटन के नज़ारे; और दूसरी तरफ़ अस्पतालों के अंधेरे कोनों में दम तोड़ती इंसानियत। इस पर कोई रिपोर्ट नहीं, कोई पर्यटक गाइड नहीं, कोई मंत्री का बयान नहीं। बस एक सन्नाटा और एक असहज सवाल।