जयपुर संपादकीय — 6 August 2026
मूक-बधिरों की अवाक् चीख
संपादक की राय
जयपुर, गुलाबी शहर, जहाँ हर पत्थर एक कहानी कहता है और हर गली में इतिहास की गूँज है। मगर इस चमचमाती रंगत के ठीक पीछे एक कड़वी हकीकत भी है, जहाँ मूक-बधिर बच्चों को पीने का पानी तक नसीब नहीं। क्या यही हमारे गौरवशाली अतीत और सुनहरे भविष्य की झाँकी है?
एक ऐसे विद्यालय में, जहाँ देश के भविष्य को गढ़ने की बात की जाती है, बच्चों को टूटी दीवारों, सूखे नलों और गंदे शौचालयों के बीच जीने को मजबूर किया गया। यह सिर्फ़ ईंट-गारे का मसला नहीं है, यह उस व्यवस्था के सड़े हुए ज़मीर का जीता-जागता सबूत है जो अपनी सबसे कमज़ोर कड़ियों को भी नज़रअंदाज़ कर देती है।
और फिर जब विरोध की आग भड़कती है, जब छात्र अपनी अवाक् भाषा में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं, तो क्या होता है? एक प्राचार्य को निलंबित कर दिया जाता है। वाह! क्या त्वरित कार्रवाई है। यह तो ठीक वैसे ही है जैसे किसी जलती हुई इमारत की खिड़की का परदा हटा देना ताकि आग भीतर न दिखे।
यह बदहाली एक दिन में पैदा नहीं हुई। यह सालों की अनदेखी, फंड्स के दुरुपयोग और “चलता है” वाली मानसिकता का नतीजा है। यह दिखाता है कि जब तक किसी बात का बतंगड़ न बन जाए, हमारी अफ़सरशाही और नेताशाही की नींद नहीं टूटती। और जब टूटती भी है, तो समाधान सतही होते हैं।
हम ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट सिटी’ जैसे भारी-भरकम शब्दों में उलझे रहते हैं, बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन शहर के एक कोने में मूक-बधिर बच्चों को साफ़ पानी के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। क्या हमारी प्राथमिकताएँ वाकई इतनी विकृत हो चुकी हैं कि बुनियादी सुविधाएँ भी प्रदर्शन के बाद ही मुहैया होती हैं?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ये बच्चे अपनी बात बोलकर नहीं कह सकते। उनकी आवाज़ कौन बनता है? जब उन्हें अपनी मूलभूत ज़रूरतों के लिए भी धरना देना पड़ता है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि हमारी व्यवस्था कितनी बहरी हो चुकी है। क्या हम सिर्फ़ उन्हीं आवाज़ों को सुनते हैं जो चुनाव में वोट बनकर आती हैं?
प्राचार्य का निलंबन एक छोटा सा अध्याय है। असली सवाल यह है कि इस पूरी श्रृंखला में कौन-कौन शामिल था—निचले स्तर से लेकर उच्चाधिकारियों तक—जिन्होंने सालों तक इस अनदेखी को पनपने दिया? क्या हम एक मोहरे को हटाकर बाक़ी सारे खिलाड़ियों को बेदाग़ मान लेंगे?
कल फिर अख़बार में नई सुर्खियाँ होंगी, और शायद यह ख़बर किसी कोने में दबकर रह जाएगी। लेकिन यह घटना उस गुलाबी शहर के माथे पर एक ऐसा बदनुमा दाग़ छोड़ गई है, जिसे न तो बयानबाज़ी से मिटाया जा सकता है और न ही किसी दिखावटी कार्रवाई से।