जयपुर संपादकीय

जंगल विभाग की छत, ज़मींदोज़ होती व्यवस्था

संपादक की राय

गुलाबी नगर की गलियों में आज जिस छत की बात होनी चाहिए थी, वह न किसी महल की भव्य छत है, न किसी नए मॉल की चमचमाती ऊपरी मंज़िल। आज बात उस सरकारी छत की है जो जंगल विभाग के दफ़्तर में, बिना किसी पूर्व सूचना के, ग्यारह लोगों को ज़मीन पर ले आई। यह सिर्फ़ एक छत का गिरना नहीं, यह उस व्यवस्था का चेहरा है जो ऊपर से चमकीली और भीतर से खोखली हो चुकी है।

कल्पना कीजिए, जिस विभाग का काम प्रकृति और वन संपदा को सहेजना है, उसकी अपनी इमारत खुद को ही नहीं सहेज पा रही। पेड़ों को बचाने की बात करने वाले दफ़्तर में, उनकी अपनी नींव कमज़ोर हो चुकी है। यह विडंबना इतनी कड़वी है कि ज़ुबान पर आते ही कसैलापन घोल देती है। क्या जंगल विभाग के अधिकारियों ने कभी अपनी छत की तरफ़ सिर उठाकर नहीं देखा, या देखकर भी अनदेखा करना उनकी सरकारी आदत का हिस्सा बन चुका है?

असल में, यह हादसा उस लंबी उपेक्षा का परिणाम है जो हमारी सरकारी इमारतों को दी जाती है। फाइलें दर-दर भटकती हैं, बजट के कागज़ों पर धूल जम जाती है, और मरम्मत का काम कागज़ों पर ही हो जाता है। जब तक कोई छत गिर न जाए, कोई पुल धँस न जाए, कोई अस्पताल का वार्ड ढह न जाए, तब तक हमारी व्यवस्था की आँखों पर पट्टी बंधी रहती है।

ग्यारह लोग घायल हुए हैं। ये सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं। ये वे कर्मचारी हैं जो सरकार के लिए काम करते हैं, जिन्होंने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनके सिर पर कोई इमारत नहीं, बल्कि बेपरवाही का मलबा गिरने वाला है। क्या उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कागज़ों पर होती है? क्या उनकी चीखें उस दिन तक नक्कारख़ाने में तूती बनकर रह जाएँगी जब तक कोई बड़ी जान का नुकसान न हो जाए?

यह जयपुर की इकलौती इमारत नहीं है जो जर्जर हालत में है। शहर के कोने-कोने में, सरकारी स्कूल, अस्पताल, और पुलिस थानों से लेकर अनगिनत दफ़्तर ऐसी ही दम तोड़ती इमारतों में चल रहे हैं। हर बारिश, हर तेज़ हवा का झोंका एक नई चेतावनी लेकर आता है, जिसे हम अपनी व्यस्तता के नाम पर टाल देते हैं।

अब देखिएगा, जाँच कमेटी बैठेगी। लीपापोती होगी। कुछ जूनियर अधिकारियों पर गाज गिरेगी। बड़ी-बड़ी बातें होंगी कि ऐसी घटना फिर नहीं होगी। लेकिन क्या इन खोखले वादों से उन ग्यारह लोगों के ज़ख्म भर जाएँगे? क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा? इतिहास गवाह है, यह सिर्फ़ एक रस्म अदायगी भर होगी।

एक तरफ़ हम जयपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की बात करते हैं, ब्रिक्स मंत्रियों की मेजबानी करते हैं और औद्योगिक सहयोग पर बड़े-बड़े प्रस्ताव पास करते हैं। दूसरी तरफ़ हमारी अपनी बुनियादी संरचना ऐसी है कि कर्मचारी अपने ही दफ़्तर में सुरक्षित महसूस नहीं करते। यह दोहरापन ही तो इस शहर की पहचान बन गया है – बाहर से चमक, भीतर से ज़ंग।

तो अगली बार जब कोई नेता विकास की बात करे, तो पूछिएगा कि क्या उस विकास में सरकारी कर्मचारियों की छत भी शामिल है, या उन्हें काम करने के लिए हमेशा सिर पर हेलमेट पहनकर बैठना होगा?