जयपुर संपादकीय — 8 August 2026
स्कूल का सौदा: भविष्य की कीमत
संपादक की राय
जयपुर की गुलाबी पहचान अब केवल इमारतों तक सिमटती जा रही है, जब बच्चों के भविष्य को निजी पूँजी के बाज़ार में नीलाम किया जा रहा है। कभी शिक्षा को संस्कार का पर्याय कहा जाता था, आज वह “टेकओवर” और “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” का नया खेल बन चुकी है। क्या यही है वह विकास जिसका ढिंढोरा पीटा जाता है?
जब शहर के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान रातों-रात निजी इक्विटी फंड्स के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान होगा या मुनाफा? बोर्डरूम की बैठकों में बच्चों के पाठ्यक्रम पर नहीं, बल्कि अगले तिमाही के राजस्व पर माथापच्ची होती है। यह कैसी शैक्षणिक क्रांति है, जहाँ किताबों की जगह बैलेंस शीट भारी पड़ रही है?
सरकारी दावों के विपरीत, जहाँ एक तरफ़ ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के बैनर हवा में झूलते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अमीरों की मिल्कियत बनती जा रही है। स्कूल अब शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि आकर्षक पैकेजिंग में लिपटे उत्पाद हैं, जिनकी कीमत हर साल बेतहाशा बढ़ती है। गरीब और मध्यम वर्ग का बच्चा इस चमकती-धमकती दुनिया में अपनी जगह कहाँ ढूंढे?
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा पिसता है वह अभिभावक, जो अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए दिन-रात खून-पसीना एक करता है। पहले फ़ीस की चिंता, फिर किताबों और पोशाक की लूट, और अब स्कूल ही बिक गया, यह डर कि अगले साल क्या नया ‘कॉर्पोरेट फ़ैसला’ उन पर थोप दिया जाएगा। उनकी मजबूरियों पर पनपता यह बाज़ार शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही लील रहा है।
प्रशासन और सरकार की चुप्पी इस पूरे खेल में एक मौन स्वीकृति की तरह है। शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार को निजी हाथों में सौंपकर, क्या हम अपने भविष्य की पीढ़ी को चंद व्यापारिक घरानों के रहमोकरम पर नहीं छोड़ रहे? नियामक संस्थाएँ बस कागज़ों पर मौजूद हैं, या उनके हाथ भी किसी अदृश्य सौदे से बंधे हैं?
कहने को तो ये निजी स्कूल ‘आधुनिक’ और ‘उच्च गुणवत्ता’ का दावा करते हैं, लेकिन क्या यह चमक असली है या महज़ एक दिखावा? अक्सर देखा गया है कि ऊंची फीस के बावजूद, शिक्षकों पर दबाव, रचनात्मकता का अभाव और रटंत विद्या का बोलबाला ही रहता है। बस नाम बदल जाता है, ब्रांडिंग नई हो जाती है, पर भीतर से खोखलापन जस का तस रहता है।
एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है जहाँ ज्ञान और अवसर की उपलब्धता आपकी जेब की गहराई से तय होगी, न कि आपकी प्रतिभा से। यह शिक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का एक नया अध्याय है, जिसे जयपुर की दीवारों पर बेशर्मी से लिखा जा रहा है। क्या यही है उस शहर की नई सुबह, जहाँ ‘गुलाबी’ अब ‘सोने’ में बदल रही है?
तो जब बच्चे अपने स्कूल की खिड़की से बाहर देखेंगे, तो क्या उन्हें शिक्षा का उज्ज्वल भविष्य दिखेगा, या किसी बड़े निवेशक का मुस्कुराता चेहरा, जो उनके भविष्य को एक अंक के तौर पर देख रहा है? सवाल हवा में तैर रहे हैं, और उनके जवाब देने वाला कोई नहीं।