जयपुर संपादकीय — 9 August 2026
गुलाबी नगर में लाठीचार्ज: महिलाओं को ‘सम्मान’
संपादक की राय
आज गुलाबी नगर ने अपने नागरिकों को “सत्कार” का एक नया पाठ पढ़ाया है। जब अपनी माँगें लेकर कुछ महिलाएँ सड़कों पर उतरीं, तो उन्हें उम्मीद थी संवाद की, सुनवाई की। मिला क्या? पानी की बौछारें और लाठियों का “स्नेहिल” स्पर्श। क्या जयपुर वाकई इतना डर गया है कि अपनी ही बेटियों की आवाज़ दबाने के लिए उसे पानी के फुहारों और पुलिस की लाठी पर भरोसा करना पड़ रहा है?
यह कोई पहली बार नहीं है, जब इस शहर ने अपने भीतर पल रहे असंतोष को ऐसे बर्बर तरीक़े से कुचला हो। हर बार वही रटा-रटाया बहाना— “क़ानून-व्यवस्था बनाए रखना”। क्या हमारी क़ानून-व्यवस्था इतनी नाज़ुक है कि कुछ विरोध करती महिलाओं को सुनते ही ढह जाती है? या फिर कुछ आवाज़ों को अनसुना करने का सबसे आसान तरीक़ा ही उन्हें पीटना और भगाना रह गया है?
सरकार बड़े-बड़े मंचों से नारी शक्ति की बात करती है, महिला सशक्तिकरण के नारे लगाती है। फिर जब यही सशक्त महिलाएँ अपने हक़ की बात करने आती हैं, तो वही पुलिस बल, वही दमनात्मक रवैया। क्या यह दोहरी नीति नहीं है? एक तरफ़ ‘बेटी बचाओ’, दूसरी तरफ़ ‘बेटी पर लाठी चलाओ’? यह ढोंग अब किसे समझा रहे हैं आप?
यह सिर्फ़ एक लाठीचार्ज नहीं है, यह उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर एक चोट है जहाँ नागरिकों को विरोध करने का अधिकार है। प्रदर्शनकारी महिलाएँ, शायद यूजीसी से जुड़े किसी मुद्दे पर थीं, मतलब शिक्षा और भविष्य से जुड़ा मामला। क्या उनकी बात इतनी तुच्छ थी कि सुना भी न गया, बस पानी की ठंडी फुहारों से शांत कर दिया गया?
गुलाबी नगर, जिसे अपनी विरासत और मेहमाननवाज़ी पर बड़ा गर्व है, वह अपनी ही जनता के लिए एक ठंडे, निर्मम शहर में बदल रहा है। टूरिस्टों के लिए मुस्कुराते दरवाज़े खुले रहते हैं, लेकिन अपने ही शहर के युवाओं और महिलाओं के लिए सिर्फ़ पुलिस के बैरिकेड्स और पानी के टैंक हैं। यह कैसा विकास है, जिसमें संवाद के रास्ते बंद कर दिए गए हैं?
सवाल यह नहीं कि पुलिस ने अपनी ड्यूटी निभाई या नहीं। सवाल यह है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है? क्या शांति बनाए रखने का मतलब यह हो गया है कि जनता की आवाज़ को पूरी तरह से दबा दिया जाए? क्या अब हर विरोध को ‘अराजकता’ मानकर उस पर पानी और लाठी बरसाना ही एकमात्र सरकारी नीति रह गई है?
जब विरोध को इस तरह कुचला जाता है, तो वह मरता नहीं, बल्कि अंदर ही अंदर रिसता रहता है। आज पानी की बौछारें और लाठियों के निशान सिर्फ़ महिलाओं के शरीर पर नहीं पड़े हैं, वे हमारे लोकतंत्र की आत्मा पर पड़े हैं। यह शांत हुई आवाज़ें कल को और बुलंद होकर लौटेंगी, या फिर ख़ौफ़ में दबकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाएँगी? चुनाव आपका है, सरकार।