जयपुर संपादकीय

एक अदद फ़ोन, निकली बड़ी ठगी की जड़

संपादक की राय

वाह रे साइबर सुरक्षा! जयपुर पुलिस ने एक चोरी हुए मोबाइल की तलाश करते-करते पूरे एक साइबर ठगी के नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया। यह खबर हमारी व्यवस्था के लिए गर्व का विषय होनी चाहिए या एक कड़वा आईना, जो दिखाता है कि कितनी बड़ी-बड़ी चोरियाँ, कितनी सुनियोजित ठगियाँ हमारी नाक के नीचे तब तक पलती रहती हैं, जब तक कोई छोटा सा, व्यक्तिगत “नुकसान” किसी अधिकारी को सीधे नहीं छू लेता?

यह इत्तेफ़ाक़ नहीं तो और क्या है कि करोड़ों का चूना लगाने वाले गिरोहों का पर्दाफाश तब होता है, जब पुलिस को एक अदद मोबाइल फोन की जीपीएस लोकेशन ट्रेस करनी पड़ती है? क्या इससे पहले तक साइबर सेल की मशीनें सिर्फ धूल फाँक रही थीं? या फिर लाखों साइबर धोखाधड़ी के मामले, जिनमें लोगों की गाढ़ी कमाई लूट ली जाती है, महज आंकड़ों की फ़ाइल बनकर रह जाते हैं क्योंकि उनके पीछे किसी ‘बिकने लायक’ फोन का सुराग नहीं होता?

शहर की सड़कों पर हर दिन जाने कितने फोन झपटे जाते हैं, जेबें कटती हैं। उन गुम हुए मोबाइलों की तलाश में पुलिस की इतनी तत्परता कहाँ चली जाती है? शायद उन छोटे मामलों में कोई बड़ा “नेटवर्क” खुलने की उम्मीद नहीं होती, या शायद उनमें उतनी सुर्खियाँ बटोरने का माद्दा नहीं होता। लेकिन यहाँ, एक चोरी ने अनजाने में एक बड़ी मछली को जाल में फँसा लिया।

यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारा पूरा तंत्र किस दिशा में काम करता है। क्या हम सिर्फ प्रतिक्रिया देने के लिए बने हैं? जब तक आग नहीं लगती, क्या हम सिर्फ धुआँ देखते रहते हैं? साइबर ठगी का यह गोरखधंधा कोई रातों-रात नहीं पनपा होगा। इसके लिए वर्षों से ज़मीन तैयार हुई होगी, अनगिनत लोगों को लूटा गया होगा। तब तक हमारी खुफिया जानकारी, हमारी तकनीकी निगरानी कहाँ सोई हुई थी?

अब इस ‘सफलता’ का डंका पीटा जाएगा। पुलिसकर्मी अपनी पीठ थपथपाएँगे, नेताओं के बयान आएँगे। लेकिन यह एक ‘चमत्कार’ जैसा है, न कि सुनियोजित प्रयास का परिणाम। यह उस बीमार व्यवस्था का प्रमाण है जहाँ छोटे अपराधों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, जब तक वे किसी बड़े कांड की चाबी न बन जाएँ। और बड़े कांड अक्सर छोटे धागे से ही सुलझते हैं, पर तब जब कोई ‘धागा’ खींचने को तैयार हो।

जिन हज़ारों लोगों के बैंक खाते खाली हुए, जिनके डिजिटल वॉलेट लूटे गए, उनके लिए यह खबर क्या मायने रखती है? क्या उन्हें अब भरोसा करना चाहिए कि उनकी शिकायत पर भी कभी ऐसी ही ‘चमत्कारी’ कार्रवाई होगी? या उन्हें यह मान लेना चाहिए कि उनकी किस्मत में कोई ‘चोरी का फ़ोन’ नहीं था जो उनके मामले को इतनी ऊँचाई पर ले जा सके?

शहर के नागरिक ठगी के नित नए तरीकों से जूझ रहे हैं, और पुलिस कभी कभार ही किसी ‘अदद फ़ोन’ के सहारे कोई बड़ा खुलासा कर पाती है। यह कैसी सुरक्षा है, जहाँ आपकी हिफाज़त एक चोरी हुए मोबाइल के भाग्य पर निर्भर करती है? क्या हमें अब हर ठगी के शिकार को एक फोन चोरी होने की दुआ करनी चाहिए, ताकि शायद उसकी किस्मत भी बदल जाए?