जयपुर संपादकीय

वंदे भारत: एक और ‘संवाद’ का नाटक

संपादक की राय

आज जब वंदे भारत एक्सप्रेस गुलाबी नगरी के स्टेशन पर थमी, और उससे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बाहर निकलीं, तो तस्वीरों में एक नई चमक दिखी। ब्रिक्स बैठक के नाम पर यह वीआईपी दौरा, क्या वाकई जयपुर के लिए कोई नया अध्याय लिखने वाला है, या यह सिर्फ़ एक और भव्यता का प्रदर्शन भर है, जिसकी चमक कुछ ही घंटों में फीकी पड़ जाएगी?

“छात्रों और युवा मीडिया पेशेवरों” के साथ संवाद का मंच सजाया गया। कैमरा फ्लैश हुए, मुस्कुराते चेहरों की भरमार थी। मगर क्या ये ‘संवाद’ सचमुच विचारों के आदान-प्रदान के लिए थे, या सिर्फ़ निर्धारित सवालों और पहले से तय जवाबों का एक सुनियोजित प्रदर्शन? क्या कोई ऐसी आवाज़ भी थी, जिसने असहज सच पूछने की हिम्मत की हो, या यह सिर्फ़ जनसंपर्क का एक और सफल अध्याय था?

जिस वंदे भारत की गति और सुविधाओं का बखान किया जाता है, क्या वह सुविधा, वह एकाग्र ध्यान एक आम नागरिक को भी मिलता है? या फिर कुछ चेहरों के लिए ही यह तेज़ रफ्तार वाली लग्जरी आरक्षित है, जहाँ ‘संवाद’ करने के बहाने एक आरामदायक यात्रा का अनुभव बेचा जाता है? बाकी देश की जनता आज भी अपनी पुरानी, खस्ताहाल ट्रेनों में धक्के खा रही है।

ब्रिक्स जैसी अंतरराष्ट्रीय बैठकें शहर को वैश्विक मानचित्र पर लाती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या ये सिर्फ़ होटल के बंद कमरों में होने वाली चर्चाएँ हैं, जिनका स्थानीय जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कोई वास्ता नहीं? क्या वैश्विक नीतियों की इस गहमागहमी में, जयपुर की अपनी सड़कों की दुर्दशा, पानी की समस्या या बढ़ती आपराधिक घटनाओं पर भी उतनी ही गंभीरता से मंथन होता है?

यह अफ़सरशाही की कौन सी प्राथमिकता है, कि एक वीआईपी दौरे के लिए सड़कें रातों-रात चिकनी हो जाती हैं, हर कोने पर सुरक्षा का कड़ा पहरा बिठा दिया जाता है, और पूरी व्यवस्था ऐसे चौकस हो जाती है मानो कोई आपातकाल हो? वही व्यवस्था, जब आम आदमी अपनी छोटी सी शिकायत लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाता है, तब क्यों इतनी सुस्त और संवेदनहीन हो जाती है?

जब जयपुर के हर गली-मोहल्ले में, उसके सरकारी दफ्तरों में, उसके अस्पतालों में अनगिनत समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं, तब इस तरह का ‘संवाद’ किसे सुनाने की कोशिश है? क्या यह सिर्फ़ दिल्ली दरबार से गुलाबी नगर को मिली एक झाँकी है, जिसमें सब कुछ चमकदार और व्यवस्थित दिखता है, जबकि परदे के पीछे की हकीकत कुछ और ही होती है?

हमें यह कैसी प्रगति दिखाई जा रही है, जहाँ हाई-स्पीड ट्रेन से आने वाले अतिथियों की खबर तो बिजली की गति से फैलती है, मगर शहर की उन बुनियादी समस्याओं की गति पर लगाम लगाने का कोई नुस्खा नहीं, जो रोज़मर्रा के जीवन को धीमा और दूभर बनाती हैं? यह सिर्फ़ गति का खेल है, या गति के नाम पर सच्चाई से पलायन?