जयपुर संपादकीय

कस्टडी में क़त्ल: क्या यही है जयपुर का नया रंग?

संपादक की राय

आज जब गुलाबी नगर अपने ‘आज़ादी के जश्न’ की तैयारी में सराबोर है, शहर के कसुअं कसुअं में एक सवाल चुभ रहा है: क्या अपराधियों के लिए अब जेल की दीवारों का कोई मोल नहीं रहा? कर्ण विहार में एक हत्या के आरोपी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी जाती है, और वह भी तब, जब वह पुलिस की ‘सुरक्षा’ में अदालत से लौट रहा था। यह सिर्फ़ एक वारदात नहीं, यह हमारी उस व्यवस्था पर बेशरम तमाचा है, जो सुरक्षा का ढोंग रचती है।

यह मंजर क्या है? एक विचाराधीन कैदी, जो पहले से ही हत्या के इल्ज़ाम में घिरा था, उसे पुलिस की गाड़ी में बिठाया जाता है, और फिर, जैसे किसी फिल्मी कहानी में होता है, हमलावर आते हैं और उसे भून डालते हैं। क्या हमारी पुलिस को उन रास्तों की खबर नहीं रहती, जिन पर उनके वाहन चलते हैं? या क्या अब अपराधियों ने अपनी ‘खुफिया’ एजेंसियों को इतना मज़बूत कर लिया है कि उन्हें पुलिस के हर कदम की भनक पहले ही लग जाती है?

हमें सिखाया गया था कि पुलिस हिरासत में मौत एक असाधारण घटना है। अब तो हिरासत में रहते हुए, अदालत से लौटते हुए, मौत इतनी सहज हो गई है कि बस खबर का एक और मामूली टुकड़ा बनकर रह जाती है। क्या यह व्यवस्था इतनी खोखली हो चुकी है कि वह अपने ही बंदियों को सुरक्षित नहीं रख सकती? या फिर यह सिर्फ़ अपराधियों के बीच का हिसाब-किताब है, जिसमें पुलिस बस दर्शक बनकर रह जाती है?

सवाल उठता है, इन हमलावरों की हिम्मत इतनी बढ़ी कैसे? क्या उन्हें पता था कि वे बिना किसी रोक-टोक के अपना काम अंजाम दे सकते हैं? क्या उन्हें यकीन था कि कानून के रखवाले उन पर हाथ नहीं डालेंगे, या अगर डालेंगे भी, तो सिर्फ़ कागज़ों पर? यह घटना बताती है कि जयपुर में ‘कानून का राज’ अब एक जुमला मात्र बनकर रह गया है, जिसे सिर्फ़ सरकारी बयानों में ही सुना जा सकता है।

गुलाबी नगरी की यह दोहरी ज़िंदगी कितनी भयानक है। एक तरफ चमचमाती इमारतें, पर्यटन की बातें, विकास के दावे; दूसरी तरफ, दिनदहाड़े गोलीबारी, सड़कों पर खून-खराबा और अपराधियों की बेलगाम ज़ुबान। हम कब तक इस छद्म विकास और दिखावटी शांति के पीछे असलियत से मुंह मोड़ते रहेंगे? क्या यह शहर अब उन लोगों का गढ़ बन गया है, जो कानून को अपने तलवों तले रौंदने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते?

तो क्या हम मान लें कि यह शहर अब ‘न्याय’ की नहीं, बल्कि ‘ताकत’ की भाषा समझने लगा है? कि अब अपराधी ही तय करेंगे कि कौन जिएगा और कौन मरेगा, भले ही वह पुलिस की ‘कस्टडी’ में क्यों न हो? इस वारदात के बाद भी अगर नींद नहीं टूटी तो फिर किस भयावह मंज़र का इंतज़ार है? बस अब एक बात और बची है कहने को: ‘गुलाबी नगरी’ को ‘खूनी नगरी’ बनने में कितनी देर लगेगी?