जयपुर संपादकीय

स्कूल कैंटीन: निवाला नहीं, काल का ग्रास

संपादक की राय

एक किशोर स्कूल गया था, पढ़ने। लौटा लाश बनकर। पेट में एक अदना सी पैटी थी, और पता नहीं कितने अनसुने सवाल। गुलाबी नगर की शिक्षा व्यवस्था की यह कैसी तस्वीर है, जहाँ ज्ञान के मंदिर में जीवन का मोल एक बासी नाश्ते से भी कम हो गया?

वह महज़ एक पैटी नहीं थी, वह कैंटीन में बिकने वाली लापरवाही का प्रतीक थी। मैदा, आलू, तेल – ये साधारण सामग्री कब ज़हर बन जाती हैं, इसका हिसाब कौन रखेगा? या फिर, यहाँ हिसाब रखने की ज़रूरत ही किसे महसूस होती है, जब तक कि कोई ज़िंदगी दाँव पर न लग जाए?

शिक्षा विभाग की फाइलें मोटी होती होंगी, जिनमें कैंटीन के नियम-कायदे भी दर्ज होंगे। स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर शायद धूल फाँक रहे होंगे, जिनमें खाद्य सुरक्षा के मानकों का बखान होगा। पर क्या कभी किसी अधिकारी ने, किसी विद्यालय प्रबंधन ने, इन कागज़ों को मेज़ से उठाकर कैंटीन की हकीकत से मिलाया है? या यह सब सिर्फ़ दिखावा है, जब तक कोई अनहोनी न हो?

अब “जांच समिति” बनेगी। कुछ बयान दर्ज होंगे, कुछ कागज़ इधर से उधर होंगे। शायद किसी छोटे कर्मचारी को बलि का बकरा बनाया जाएगा, और फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी। ‘पड़ताल जारी है’ का जुमला, और उसके बाद एक ठंडी चुप्पी, जब तक कि अगली घटना किसी और मासूम को निगल न ले।

सवाल सिर्फ़ स्कूल कैंटीन का नहीं है। सवाल उस पूरे तंत्र का है जो बच्चों की सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ खानापूर्ति करता है। उन माता-पिता का भी है, जो अपनी सुविधा के लिए आँखें मूँद लेते हैं, यह जानते हुए भी कि उनके बच्चे कैसी जगह पर क्या खा रहे हैं।

यह जयपुर की कोई पहली लाश नहीं, जो किसी कैंटीन के बासी निवाले ने ली हो। लेकिन हर बार, हमारी सामूहिक स्मृति एक नए हादसे की खबर के साथ उतनी ही जल्दी बासी हो जाती है। क्या हमें सचमुच किसी बड़ी त्रासदी का इंतज़ार है, ताकि हम बुनियादी सुरक्षा नियमों को गंभीरता से ले सकें?

अगले किशोर की बारी कब? और कौन देगा इस सवाल का जवाब, जब हर कोई बस अपनी गर्दन बचाने में लगा है?