जयपुर संपादकीय

छत गिरी, तब नींद टूटी

संपादक की राय

आज जब गुलाबी नगरी के बच्चों के सिर पर छत गिरने की ख़बर आई, तो उन सभी “कॉकक्रोच जनता पार्टी” वालों की नींद टूट गई, जो शायद साल भर किसी दफ़्तर की अंधेरी अलमारियों में दुबके रहते हैं। सवाल यह नहीं कि छत क्यों गिरी, सवाल यह है कि गिरी हुई छत पर कैमरे क्यों चमकते हैं, और खड़ी छत की मरम्मत पर क्यों नहीं?

जिस भवन को ज्ञान का मंदिर कहा जाता है, जहाँ देश का भविष्य आकार लेता है, उसकी ईंट-ईंट और दीवार-दीवार अपनी बदहाली की कहानी कहती है। मगर किसी को कान नहीं सुनाई देते, किसी को आँखें नहीं दिखाई देतीं। जब छत भरभराकर गिरती है, तब अचानक नेताओं का “दिल” पसीजता है, और वे घटनास्थल पर पहुँचकर संवेदनाओं का नाटक मंचित करते हैं।

यह कैसा तमाशा है कि हम हर आपदा के बाद ही ‘जागरूक’ होते हैं? क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा केवल तब मायने रखती है, जब कोई हादसा उन्हें सुर्खियों में ला दे? ये ढहती छतें सिर्फ़ इमारत का ढाँचा नहीं गिरातीं, ये उस भरोसे को भी चूर-चूर करती हैं, जो आम आदमी सरकारी व्यवस्था पर करता है।

“कॉकक्रोच जनता पार्टी” नाम का एक अद्भुत प्राणी-वर्ग है। ये तब प्रकट होते हैं जब कहीं सड़ांध होती है, कहीं कोई ढाँचा चरमरा रहा होता है। जैसे ही संकट गहराता है, ये बिलों से निकलकर रोशनी में आते हैं, गिरे हुए पत्थरों पर खड़े होकर बयान देते हैं और फिर अगली आपदा का इंतज़ार करते हुए लौट जाते हैं। इनका काम समाधान नहीं, बल्कि मलबे पर राजनीति करना है।

बरसों से, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, इन सरकारी स्कूलों की इमारतें हमें चिढ़ा रही हैं। उनकी टूटी खिड़कियाँ, उखड़ते प्लास्टर, और जर्जर दीवारें हर बच्चे के भविष्य पर एक सवालिया निशान लगाती हैं। क्या कभी किसी ने सोचा कि इन इमारतों को ‘पब्लिक स्कूल’ जैसी सुविधाओं की ज़रूरत क्यों नहीं महसूस होती? जवाब सीधा है: क्योंकि यहाँ उन बच्चों के अभिभावक पढ़ते हैं, जिनकी जेब इतनी भारी नहीं कि वे नेताओं को प्रभावित कर सकें।

कब तक हम इस नाटक के दर्शक बने रहेंगे? कब तक हमारे बच्चे उन इमारतों में पढ़ने को मजबूर होंगे, जिनकी मियाद दशकों पहले ख़त्म हो चुकी है? क्या इस देश में बच्चों की जान की क़ीमत इतनी सस्ती है कि एक छत गिरने के बाद ही कुछ आवाज़ें उठती हैं, और फिर वे भी मौन की चादर ओढ़ लेती हैं? इस चुप्पी का बोझ भी तो हमारी ही आने वाली पीढ़ियाँ ढोएँगी।