जयपुर संपादकीय — 17 August 2026
गुलाबी शहर में मौत का मज़दूर बाज़ार
संपादक की राय
तीन साल। पूरे तीन साल तक गुलाबी शहर की आबोहवा में मौत का सामान परोसा जाता रहा। मज़दूरों की आड़ में हथियार बेचे गए, ख़रीदे गए और बाज़ार सजा। जिस नगरी की पहचान शिल्प और संस्कृति से है, उसकी नींव में अवैध हथियारों का कारोबार इतनी बेफ़िक्री से चलता रहा, क्या हमारी व्यवस्था के लिए इससे बड़ा मज़ाक कोई हो सकता है?
सोचिए, सड़क किनारे, किसी निर्माण स्थल पर, या किसी बस्ती में, जहाँ दिन भर पसीने से तरबतर मज़दूर मेहनत की ईंटें जोड़ते हैं, वहीं उनके बीच कुछ और ही ईंटें रखी जा रही थीं – बारूद और गोली की ईंटें। हमारी पुलिस का खुफिया तंत्र क्या तब सिर्फ़ गुलाबी रंग के सपने देख रहा था, जब इन “मज़दूरों” के हाथों में रेती-सीमेंट की जगह कट्टे और कारतूस होते थे?
यह महज़ दो लोगों की कहानी नहीं। तीन साल का अर्थ है कि यह एक संगठित तंत्र था, जिसकी जड़ें कहीं गहरी थीं। तीन साल तक एक शहर में हथियारों की कालाबाज़ारी चलती रहे और किसी को कानों-कान खबर न हो, तो सवाल उन छोटी मछलियों पर नहीं, बल्कि उस जाल पर उठते हैं जो इतना ढीला था। क्या शहर के रखवाले अपनी नींद में इतने गहरे थे कि उन्हें अपने ही आँगन में पनप रहे इस ज़हरीले धंधे की भनक तक नहीं लगी?
जयपुर की सड़कों पर, बाज़ारों में, भीड़ भरी गलियों में आम आदमी सुरक्षा की उम्मीद करता है। लेकिन जब उसे पता चलता है कि जिस शहर में वह रहता है, वहाँ सालों तक मज़दूरों के वेश में अपराधियों ने मौत का सौदा किया है, तो उसका भरोसा किस पर रहे? क्या हम अब हर मेहनतकश चेहरे को शक़ की निगाह से देखें, या अपनी उन संस्थाओं से सवाल करें, जिनका काम हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करना है?
यह घटना एक आईना दिखाती है। यह सिर्फ़ हथियारों की तस्करी का मामला नहीं, यह उस सामाजिक ताने-बाने के कमज़ोर पड़ने का प्रतीक है, जहाँ अपराधी इतने बेख़ौफ़ होकर अपना काम कर जाते हैं कि उन्हें किसी वर्दी, किसी कानून का खौफ नहीं होता। मज़दूरों का लिबास उनके लिए एक बेहतरीन कवच बन गया, ठीक वैसे ही जैसे हमारी सरकारें अक्सर ‘विकास’ के परदे के पीछे अपनी नाकामियों को छुपाती हैं।
यह व्यंग्य भी है और चेतावनी भी। व्यंग्य इस बात पर कि गुलाबी नगर की सुरक्षा व्यवस्था का ढोंग कितनी आसानी से उघड़ गया, और चेतावनी इस बात की कि जो हथियार तीन साल तक बेचे गए, उनका इस्तेमाल कहाँ-कहाँ हुआ होगा? कितने अपराधों में उनकी गूँज सुनाई दी होगी, जिसका हिसाब आज तक नहीं हुआ?
आज जब यह खबर सामने आई है, तो सवाल यह नहीं कि इन दो “मज़दूरों” का क्या होगा। असल सवाल यह है कि ऐसे कितने और ‘मज़दूर’ आज भी हमारी आँखों के सामने अपना काला धंधा चला रहे होंगे, और हमारी व्यवस्था कब तक गुलाबी चश्मे पहने सोती रहेगी? क्या इस शहर की दीवारों पर लिखा ‘अतिथि देवो भव’ अब ‘अतिथि सावधान’ में बदल जाएगा?