जयपुर संपादकीय

शाहीन नगर: प्यार का लहू, या समाज का दाग

संपादक की राय

आज फिर एक ख़बर आती है, शाहीन नगर से। एक इक्कीस साल की लड़की की ज़िंदगी, जो शायद अभी सपनों के रंग भर ही रही थी, अचानक बेरंग कर दी गई। और शक की सुई कहाँ घूमती है? उसके “लिव-इन पार्टनर” पर। गुलाबी नगर की फ़र्श पर ये कैसा ख़ून है, जो रिश्तों के नाम पर बहता है और हमें हर बार अवाक् छोड़ जाता है?

कहने को तो हम जयपुर को विरासत, संस्कृति और अतिथि-सत्कार का शहर बताते हैं। पर इस चकाचौंध के नीचे, क्या एक स्याह दुनिया भी पल रही है, जहाँ किसी की जान इतनी आसानी से ले ली जाती है? अख़बारों के पन्ने पलटते हुए यह सवाल चुभता है कि जिस रिश्ते को आज़ादी और समझदारी का नाम दिया जाता है, वही रिश्ता अक्सर खामोश हिंसा और आख़िरकार खूनी अंजाम तक कैसे पहुँच जाता है।

पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया है, यह अपेक्षित है। कागज़ पर कार्रवाई होगी, बयान दर्ज होंगे, शायद आरोप भी तय होंगे। लेकिन क्या यह सिर्फ़ एक और फ़ाइल बंद करने की कवायद है, या व्यवस्था कभी इस गहराई में झाँकने की ज़हमत उठाएगी कि हमारे समाज में रिश्तों की यह नई परिभाषा इतनी ज़हरीली क्यों होती जा रही है? यह सिर्फ़ व्यक्तिगत अपराध नहीं, एक सामूहिक विफलता का प्रतीक है।

हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं महिला सुरक्षा की, सशक्तिकरण की, पर हर दूसरे दिन किसी घर में, किसी किराए के कमरे में एक बेटी या बहन की चीख़ें दब जाती हैं। क्या हमारी ‘आधुनिकता’ ने हमें इतना बेपरवाह बना दिया है कि हम इन संकेतों को देखना ही भूल गए हैं? या फिर हम जानबूझकर आँखें मूँद लेते हैं, क्योंकि सच का सामना करना असहज होता है?

यह कोई पहली घटना नहीं है और दुखद है कि आख़िरी भी नहीं होगी। ऐसी ख़बरें अब एक पैटर्न बन चुकी हैं – शहर के किसी कोने में एक जवान ज़िंदगी का असमय अंत, और हर बार कारण प्रेम, संबंध या विवाद। क्या यह सिर्फ़ ‘युवाओं की समस्या’ है, या हम बड़ों ने उन्हें ऐसे रिश्ते गढ़ने की कौन सी शिक्षा दी है जहाँ संवाद की जगह हिंसा ले लेती है?

सत्ता के गलियारों में बैठे लोग नारी सम्मान के भाषण देते नहीं थकते। योजनाओं की फ़ेहरिस्त लंबी है, वादों की पोटली भारी। पर ज़मीन पर उस इक्कीस साल की लड़की की सुरक्षा की गारंटी कौन देता, जिसे शायद लगा था कि वह अपने साथी के साथ सुरक्षित है? इन योजनाओं का क्या मोल, जब शहर के मोहल्लों में घर के भीतर ही असुरक्षा का दानव कुंडली मारकर बैठा हो?

जब हर दूसरा रिश्ता, हर दूसरी ज़िंदगी इस तरह से पहेली बन जाए, तो सवाल सिर्फ़ अपराधी पर नहीं उठता। सवाल उस समाज पर भी उठता है, जो अपनी चुप्पी और उदासीनता से ऐसे अपराधों को कहीं न कहीं खाद-पानी देता रहता है। क्या हम सिर्फ़ अगली वारदात का इंतज़ार कर रहे हैं, या कभी ठहरकर पूछेंगे कि शाहीन नगर की इस गली में बहता यह लहू सिर्फ़ प्यार का था, या हमारे समाज के माथे पर लगा एक और गहरा दाग?