जयपुर संपादकीय

‘बुरा स्पर्श’ पर ‘अच्छी’ ट्रेनिंग: वाह रे व्यवस्था!

संपादक की राय

आज जब खबर बनती है कि राजस्थान का शिक्षा विभाग अपने शिक्षकों को ‘बुरा स्पर्श’ क्या होता है, यह सिखाने के लिए प्रशिक्षण देगा, तो एक पल को लगता है कि हम किस सदी में जी रहे हैं? क्या हमारे शिक्षकों को, जो नौनिहालों का भविष्य गढ़ने का दावा करते हैं, यह भी नहीं पता कि बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना है और कैसा नहीं? क्या यह ज्ञान उन्हें किसी पाठ्यक्रम या अनुभव से नहीं, बल्कि अब सरकारी ‘ट्रेनिंग’ से मिलेगा?

यह खबर अपने आप में एक कड़वी गवाही है कि हमारे समाज में और हमारी व्यवस्था में बच्चों की सुरक्षा का मुद्दा किस निचले पायदान पर है। स्कूलों को कभी ज्ञान का मंदिर कहा जाता था, आज वह ऐसी जगहें बनती जा रही हैं जहाँ बच्चों को सिखाने से पहले शिक्षकों को ‘बुरा स्पर्श’ न करने की नसीहत देनी पड़ती है। क्या यह हमारी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि जिन हाथों में हमने अपने भविष्य की बागडोर सौंपी है, उन पर आज भरोसा करने से पहले ऐसी ‘प्रशिक्षण’ की कसौटी पर कसना पड़ रहा है?

यही है हमारी नौकरशाही का कमाल। जब समस्या हद से बढ़ जाती है, जब शिकायतें इतनी आ जाती हैं कि उन्हें दबाना मुश्किल हो जाता है, तब कोई बाबू अचानक जागता है और ‘समस्या के समाधान’ के नाम पर एक ‘प्रशिक्षण कार्यशाला’ का प्रस्ताव दे देता है। लगता है जैसे कोई जादू की छड़ी है, जो चंद घंटों के पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन और कुछ ‘विशेषज्ञों’ के प्रवचनों से सदियों पुरानी विकृतियों को दूर कर देगी।

सवाल यह है कि ये ‘बुरा स्पर्श’ की शिकायतें आती कहाँ से हैं? क्या ये अचानक आसमान से टपकती हैं, या दशकों से इस व्यवस्था के भीतर पल रही थीं और हमने आँखें मूँदे रखीं? यह कोई नई परिघटना नहीं है; हर माता-पिता को स्कूल भेजते वक्त एक अनकही चिंता सताती है। विभाग की नींद अब क्यों टूटी? क्या कुछ हालिया, भयावह घटनाओं ने उन्हें मजबूर किया या बस कैलेंडर में ‘प्रशिक्षण दिवस’ की खाली जगह भरनी थी?

क्या इस ‘प्रशिक्षण’ में यह भी बताया जाएगा कि ‘बुरा स्पर्श’ के बाद क्या होता है? उन बच्चों का क्या, जिन्हें मानसिक और भावनात्मक तौर पर जीवन भर का घाव मिलता है? क्या एक सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाला शिक्षक, जिसने ‘बुरा स्पर्श’ पर ‘ट्रेनिंग’ ली है, भविष्य में ऐसा नहीं करेगा? या यह सिर्फ एक कागज़ी कार्रवाई है, जिससे विभाग अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ सके कि ‘हमने तो ट्रेनिंग दी थी’?

हमारी गुलाबी नगरी की एक पहचान उसकी दोहरी ज़िंदगी भी है। एक तरफ़ भव्य शिक्षण संस्थान, चमकते यूनिफॉर्म में बच्चे, ‘आधुनिक शिक्षा’ के दावे; दूसरी तरफ़ इन्हीं चारदीवारों के भीतर पल रहे डर और असुरक्षा की कहानियाँ। यह ‘बुरा स्पर्श’ सिर्फ़ शारीरिक नहीं होता, यह विश्वास को, मासूमियत को और व्यवस्था पर भरोसे को भी छूकर मैला कर जाता है।

यह ‘प्रशिक्षण’ उन मासूमों के लिए क्या करेगा, जो पहले ही ऐसे ‘बुरा स्पर्श’ से गुज़र चुके हैं? क्या यह उनकी रातों की नींद लौटा पाएगा, या स्कूल जाने के डर को मिटा पाएगा? नहीं, यह तो सिर्फ़ एक लीपापोती है। असली दाग तो बच्चों के मन पर हैं, और उस व्यवस्था पर, जिसने इतने लंबे समय तक अनदेखी की।

तो अगली बार जब शिक्षा विभाग ‘बदलाव’ का दावा करे, तो ज़रा पूछिएगा: क्या यह ‘बदलाव’ सचमुच ज़मीन पर दिखेगा, या सिर्फ़ एक और ‘ट्रेनिंग’ की फ़ाइल में दफ़न होकर रह जाएगा? और तब तक, हमारे बच्चे किसके भरोसे हैं – विभाग के नए नियम या अपनी क़िस्मत के?