जयपुर संपादकीय

रबर-बैंड कानून और एक जान की कीमत

संपादक की राय

एक एस्टन मार्टिन का गर्जन, टायर की एक चीख, और फिर सन्नाटा। यह सन्नाटा एक ज़िंदगी को निगल जाता है, मगर सत्ता के मद में चूर रसूखदारों के दुस्साहस को नहीं। भारती मुखी, एक और साधारण नाम, न्याय के गुमशुदा बहीखाते में दर्ज हो गया, जबकि एक “सांसद का बेटा” अपनी महंगी गाड़ी से शायद खरोंच भी नहीं पाया।

यह घटना हैदराबाद की है, जहाँ एक 26 वर्षीय मॉल कर्मचारी, भारती, अपनी नियति से नहीं, बल्कि एक तेज रफ्तार लग्जरी कार से टकराकर खत्म हो गई। कार के चालक थे लिंगामनेनी संजूश, राज्यसभा सांसद लिंगामनेनी रमेश के बेटे। गाड़ी एस्टन मार्टिन थी, जिसकी कीमत आसमान छूती है; एक जीवन, ज़ाहिर है, इतना कीमती नहीं।

पुलिस ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा दिखाते हुए भारतीय न्याय संहिता के तहत ‘लापरवाही से मृत्यु’ का मामला दर्ज कर लिया। लेकिन असली खबर तो चीख रही है: “अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं।” यह हमारे तंत्र का कमाल का संतुलन है – नया कानून आ गया, पर ताकतवरों के लिए वही पुरानी सहूलियतें आज भी बरकरार हैं।

बताया गया कि संजूश ने शराब या ड्रग्स का सेवन नहीं किया था। शारीरिक रूप से भले ही वह साफ-सुथरा पाया गया हो, पर क्या उसका अंतरात्मा भी उतनी ही बेदाग है? वह “तुरंत अस्पताल ले गया” था, यह कहकर अक्सर जवाबदेही के कड़वे सच को बड़े आराम से लपेटा जाता है।

यह कैसा न्याय है, जहाँ मखमली गद्दियों पर बैठे लोगों के बेटों के हाथों हुई दुर्घटनाएँ “लापरवाही” का छोटा-सा फुटनोट बनकर रह जाती हैं, जबकि सड़कों पर आम आदमी को बेगुनाही साबित करने में दशकों लग जाते हैं? क्या हमारे देश में ‘मृत्यु’ की परिभाषा भी आर्थिक हैसियत से तय होती है?

जयपुर से हजारों मील दूर यह घटना, गुलाबी नगर की अपनी कहानियों से कितनी मिलती-जुलती है। सत्ता के गलियारों में घूमते ऐसे ही “खास” लोगों के लिए कानून अक्सर एक रबर-बैंड बन जाता है – जब चाहे, जितना चाहे खींच लो, टूटता नहीं।

तो, हम क्या उम्मीद करें? एक और समझौते की? एक और “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” की खामोश स्वीकारोक्ति की? या फिर, न्याय की वह कड़वी गोली, जिसे सिर्फ़ आम जनता को निगलना सिखाया गया है, वह कभी इन आलीशान गाड़ियों के शीशे भी तोड़ पाएगी? सवाल सिर्फ़ सड़क पर नहीं, हमारे सामूहिक विवेक पर भी कुचल गया है।