जयपुर संपादकीय

सरकारी स्कूलों की टूटी छतें और टूटी हड्डियाँ

संपादक की राय

शीर्षक: शिक्षा का सच: निरीक्षण पर हमला, इमारतें कहाँ

वह जयपुर है या कोई अबूझ पहेली? जहाँ कथित तौर पर शिक्षा की हालत देखने गए लोगों की हड्डियाँ तोड़ दी जाती हैं, गाड़ियाँ चूर-चूर कर दी जाती हैं। यह कैसा ‘गुलाबी शहर’ है, जहाँ सच का सामना करने वाले को खून-खराबे से रोका जाता है। क्या स्कूलों की दीवारें इतनी कच्ची हैं कि एक साधारण निरीक्षण भी उन्हें हिला देता है?

सवाल यह नहीं कि सीजेपी के कार्यकर्ता वहाँ क्यों गए थे, सवाल यह है कि उन्हें क्यों रोका गया। वह कौन सा राज है जिसे शिक्षा के मंदिर में छिपाया जा रहा था कि उस पर परदा डालने के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ा? क्या बच्चों का भविष्य इतना कमज़ोर है कि उसे ‘स्थानीय लोगों’ के नाम पर डंडों से बचाया जाए?

और फिर, इस हंगामे के ठीक बाद, सरकार का बेझिझक बयान आता है कि प्रदेश के 611 स्कूल ऐसे हैं जिनकी अपनी कोई इमारत ही नहीं है! क्या कमाल का संयोग है! क्या यह कबूलनामा किसी दबाव का नतीजा है, या सरकार को उम्मीद थी कि इस खुलासे से जनता की आँखें चौंधिया जाएंगी और वह सीजेपी पर हुए हमले को भूल जाएगी?

इन 611 स्कूलों के बच्चों को क्या पढ़ाया जा रहा है, कहाँ पढ़ाया जा रहा है? ज़रा सोचिए, जिन स्कूलों की ‘जमीन’ ही नहीं है, वहाँ बच्चे कैसे खड़े होते होंगे? क्या उन्हें पेड़ों के नीचे ‘प्राकृतिक’ शिक्षा दी जा रही है, या फिर खुली धूप में ‘आत्मनिर्भर’ होने का पाठ पढ़ाया जा रहा है?

यह कोई संयोग नहीं कि ऐसी रिपोर्टें हमेशा तभी सामने आती हैं जब कोई ‘बाहरी’ नज़र व्यवस्था की कमियों पर पड़ती है। वरना तो हमारे अफ़सर, मंत्री और स्थानीय नेता हर मंच से शिक्षा की उज्ज्वल तस्वीर पेश करते नहीं थकते। क्या यह सच नहीं कि इस ‘खुलासे’ के लिए भी किसी के सिर पर लाठी पड़नी ज़रूरी थी?

कहा जा रहा है कि इसमें ‘साज़िश’ की बू आ रही है। राजस्थान की राजनीति में साज़िश और आरोप-प्रत्यारोप का खेल कोई नया नहीं। यहाँ हर समस्या का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ दिया जाता है, और असली मुद्दा वहीं का वहीं धँसा रह जाता है – ठीक उन 611 ‘इमारत-विहीन’ स्कूलों की नींव की तरह, जो कभी बनी ही नहीं।

जब एक जाँच दल को सिर्फ़ स्कूल की ज़मीनी हक़ीक़त देखने के लिए पीटा जाता है, तो यह सिर्फ़ एक घटना नहीं रहती। यह एक चेतावनी बन जाती है। एक संदेश कि व्यवस्था पर सवाल उठाने की कोशिश मत करो, वरना तुम्हें भी ‘स्थानीय लोगों’ के क्रोध का सामना करना पड़ेगा।

जयपुर में पर्यटन मंत्री ‘ब्रिक्स घोषणा’ पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, विश्व पर्यटन को बढ़ावा देने की बात हो रही है, और उसी समय कुछ किलोमीटर दूर शिक्षा के नाम पर धब्बा लगी सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है। क्या यह हमारे दोहरे जीवन की सबसे कड़वी तस्वीर नहीं है?