जयपुर संपादकीय

शिक्षा की गोशाला, और जश्न ‘जीत’ का

संपादक की राय

गुलाबी नगरी के किसी कोने में, जिस जगह इंसान के बच्चों को भैंसों के बीच बैठ कर अक्षर ज्ञान लेना पड़ रहा हो, वहाँ ₹18 लाख के ‘महान सुधार’ को ‘जीत’ बताकर तालियाँ पीटते देखना, दिल को कचोटता है। यह शिक्षा है या तमाशा? क्या वाकई हम इस स्तर पर आ गिरे हैं, जहाँ बच्चों के लिए न्यूनतम मानवीय सुविधा को संघर्ष के बाद मिली ‘विजय’ घोषित किया जाता है?

उस स्कूल की तस्वीर ज़हन में कौंधती है, जहाँ भविष्य के नागरिकों को जानवरों के बाड़े में पढ़ाया जा रहा था। क्या हमारे तंत्र को, हमारे मंत्रियों और अफ़सरों को यह दृश्य तब तक नहीं दिखा, जब तक किसी बाहरी संस्था ने इसे उजागर नहीं किया? क्या उनकी आँखों पर सिर्फ़ फ़ीता काटने वाली परियोजनाओं की चमक ही चढ़ी रहती है?

और फिर सरकार का बयान आता है कि प्रदेश में 611 स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपनी इमारतें तक नहीं। 611! एक स्कूल पर ₹18 लाख का मरहम लगा, तो बाकियों का क्या? क्या हर ‘गोशाला स्कूल’ को अपनी बारी का इंतज़ार करना होगा, किसी कैमरे के आने का, किसी रिपोर्ट के छपने का, ताकि उसे भी ‘विकास’ के इस महायज्ञ में छोटी सी आहुति मिल सके?

जयपुर, जो खुद को स्मार्ट सिटी कहता है, जहाँ बड़े-बड़े होर्डिंग लगते हैं और विकास की गाथाएँ गाई जाती हैं, वहाँ ऐसी बुनियादी कमियों पर पर्दा कब तक डाल कर रखा जाएगा? हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं? भव्य स्मारक, चमकती सड़कें, या बच्चों का भविष्य, जो आज भी कच्ची ज़मीन पर बैठा, आसमान को छत मान कर पढ़ रहा है?

यह सिर्फ़ एक स्कूल की बात नहीं, यह हमारे पूरे सिस्टम की, हमारी उदासीनता की पोल खोलता है। हर साल शिक्षा पर हज़ारों करोड़ के बजट का क्या होता है? क्या वह कागज़ों पर ही स्कूल बनाता है, और ज़मीन पर बच्चे आज भी खुली हवा में, धूल फाँकते हुए ज्ञान के लिए तरसते रहते हैं?

इस ‘जीत’ का जश्न मनाने वाले ज़रा सोचें, क्या यह वाकई जीत है? या यह हमारी सामूहिक विफलता का एक कड़वा प्रतीक है, जिसे सुधार के नाम पर महिमामंडित किया जा रहा है? ₹18 लाख किसी स्कूल की बदहाली को छुपाने का एक छोटा सा प्रयास हो सकता है, लेकिन यह उन हज़ारों बच्चों के सवालों का जवाब नहीं, जिनकी आँखें आज भी एक अदद छत की तलाश में हैं।

हम कब तक ऐसे ‘जुगाड़’ को ‘क्रांति’ बताते रहेंगे? कब तक हम शिक्षा जैसे पवित्र कार्य को किसी एनजीओ के हस्तक्षेप का मोहताज बनाकर रखेंगे? क्या हमारी सरकारें वाकई इतनी लाचार हैं, या वे जानबूझकर इन बुनियादी समस्याओं से आँखें फेरती रहती हैं?

तो चलिए, आज इस ‘महान जीत’ का जश्न मनाइए। उन बच्चों के नाम पर, जो अब भैंसों के साथ नहीं पढ़ेंगे, बल्कि शायद एक मामूली मरम्मत वाले कमरे में बैठेंगे। लेकिन क्या अगली बार किसी और ‘गोशाला स्कूल’ की ख़बर आएगी, तो हम फिर ऐसे ही ‘विजय’ का ढोल पीटेंगे, या फिर वाकई कोई ठोस, स्थायी बदलाव देखेंगे?