जयपुर संपादकीय — 24 August 2026
465 करोड़ का फ्रॉड: कागज़ पर देश, जेब में विदेश
संपादक की राय
चार सौ पैंसठ करोड़ रुपए। यह सिर्फ़ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि उस अदृश्य लूट का चेहरा है जो इस गुलाबी शहर की चमक के पीछे पलती रहती है। जब वित्त का रखवाला, एक चार्टर्ड अकाउंटेंट, ही शेल कंपनियों के मायाजाल से विदेशी रेमिटेंस में इतनी बड़ी धोखाधड़ी का सूत्रधार बनता है, तो फिर सवाल कागज़ों पर नहीं, सीधे हमारे भरोसे पर उठ खड़ा होता है।
ये शेल कंपनियाँ सिर्फ़ कागज़ के घोड़े हैं, जिनकी लगाम अकसर ऐसे शातिर हाथों में होती है जो कानून की बारीकियाँ जानते हैं, और उससे भी बेहतर, उसकी कमज़ोरियाँ पहचानते हैं। विदेशों में पैसा भेजना और फिर उसे वापस ‘साफ़’ करके लाना — यह कोई नया करतब नहीं। दशकों से यह खेल चल रहा है, बस खिलाड़ी और रकम बदल जाती है।
हमारे सिस्टम की महिमा देखिए। जिस पेशेवर पर हम अपने व्यापार और वित्त का भार सौंपते हैं, जिसके हस्ताक्षर पर कागज़ात ‘पवित्र’ हो जाते हैं, वही अगर इस कागज़ी खेल का मुख्य किरदार निकले तो सवाल सिर्फ़ नीयत पर नहीं, पूरी निगरानी व्यवस्था पर उठते हैं। क्या ये ‘देखने वाले’ सिर्फ़ तब देखते हैं जब पर्दाफाश हो चुका होता है, या फिर तब जब किसी और खेल में कोई और खिलाड़ी पकड़ा जाता है?
यह फ्रॉड सिर्फ़ एक व्यक्ति की करतूत नहीं, बल्कि एक गहरी पैठ बना चुकी प्रवृत्ति का लक्षण है। छोटे-मोटे चोर-उचक्कों पर शोर मचता है, उन्हें तुरंत पकड़कर चौराहे पर खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन ये बड़े-बड़े खेल अकसर तब तक पर्दे में रहते हैं जब तक सब कुछ लुट नहीं जाता। इस तरह की धोखाधड़ी देश की आर्थिक रीढ़ को भीतर से खोखला करती है।
सरकारें ‘पारदर्शिता’ और ‘ईमानदारी’ के बड़े-बड़े दावे करती हैं, ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा देती हैं, और हर नागरिक से पाई-पाई का हिसाब मांगती हैं। लेकिन जब कागज़ पर बनी कंपनियाँ अरबों का चूना लगाती हैं और पैसा सरहदों के पार चला जाता है, तब ये दावे कहाँ चले जाते हैं? क्या हमारे कानून सिर्फ़ आम आदमी को बांधने के लिए हैं, या उन ‘बुद्धिजीवियों’ को भी जो सिस्टम की चालों को बखूबी समझते हैं?
एक पकड़ा गया, तो कितने और ऐसे ‘वित्तीय जादूगर’ अभी भी अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे होंगे? कितने और 465 करोड़ अभी भी कागज़ के जाल में फंसे होंगे, जिनका पता कभी नहीं चलेगा? यह सवाल हवा में तैरता रहेगा, जब तक कोई और फ्रॉड उजागर नहीं होता।
गुलाबी नगर की इस चमक-दमक के पीछे ऐसे ही अदृश्य धागों से बुने हुए काले कारनामे हैं। क्या हम सिर्फ़ तब तक आँखें बंद रखेंगे, जब तक अगला बड़ा धमाका न हो जाए? या फिर ये मान लिया जाए कि कुछ खेल ऐसे होते हैं, जिनमें पकड़ने वाले और पकड़े जाने वाले, दोनों ही इस व्यवस्था के अंग हैं?