जयपुर संपादकीय

दो हज़ार करोड़ का हिसाब-किताब

संपादक की राय

जयपुर को गुलाबी नगर कहें, या अब काले धन का नया ठिकाना? जब गुलाबी दीवारों के पीछे बैठे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के दफ़्तर से २,३९५ करोड़ रुपये के विदेशी हवाला कारोबार का पर्दाफ़ाश होता है, तब यह सवाल हवा में नहीं, बल्कि सीधे हमारे ईमान पर चोट करता है। यह किसी गली-नुक्कड़ का छोटा-मोटा घोटाला नहीं, यह तो पूरी अर्थव्यवस्था को खोखला करने का सुनियोजित जाल है।

जो हिसाब-किताब का विशेषज्ञ हो, वही इतने बड़े पैमाने पर बेहिसाब खेल रचे, यह कैसी विडंबना है? चार्टर्ड अकाउंटेंट की डिग्री कभी भरोसे और पारदर्शिता की प्रतीक हुआ करती थी। अब लगता है, यह डिग्री महज़ बड़े फ्रॉड की चाबी बन गई है। ये लोग क़ानून की हर बारीक लूपहोल को जानते हैं और उसका फ़ायदा उठाते हैं, जबकि आम आदमी अपने छोटे से हिसाब के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटता रह जाता है।

सवाल सिर्फ़ इस एक सीए पर नहीं, सवाल उन सारे तंत्र पर है जो इतनी बड़ी रक़म को देश से बाहर भेजने और भीतर लाने में वर्षों तक आँखें मूँदकर बैठा रहा। क्या हमारी वित्तीय एजेंसियाँ सिर्फ़ छोटे-मोटे मामलों में ही चुस्ती दिखाती हैं? या फिर ये हज़ारों करोड़ के खेल इतने शातिर तरीक़े से किए जाते हैं कि उनका पता लगाना असंभव है?

यह घटना सिर्फ़ एक आर्थिक अपराध नहीं, यह गुलाबी शहर की दोहरी ज़िंदगी का कच्चा चिट्ठा है। एक तरफ़ जहाँ हम अपनी प्राचीन विरासत और पर्यटन पर इतराते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ यह दिखाता है कि सत्ता के गलियारों के नज़दीक बैठकर कुछ लोग किस बेख़ौफ़ी से देश के पैसों से खिलवाड़ कर रहे हैं। यहाँ महज़ पत्थर गुलाबी नहीं होते, बल्कि कुछ लोगों के हाथ भी इस तरह के गोरखधंधों से लाल हो रहे हैं।

आज जब एक रिक्शावाला अपनी मेहनत की कमाई से दो वक़्त की रोटी के लिए जूझता है, तब यह ख़बर उन लोगों के मुँह पर तमाचा है जो देश की आर्थिक नींव को दीमक की तरह चाट रहे हैं। २,३९५ करोड़ रुपये – यह आँकड़ा सिर्फ़ संख्या नहीं, यह सैकड़ों स्कूलों, अस्पतालों, या साफ़ पानी की योजनाओं का बजट हो सकता था, जिसे कुछ लोगों ने अपनी तिजोरियों में बंद करने की कोशिश की।

ऐसे मामलों में अक्सर होता क्या है? बड़ी-बड़ी बातें, लंबी-चौड़ी जाँचें, और फिर वही ढीली पड़ती कार्यवाही। अख़बारों की सुर्ख़ियों से जब मामला उतरता है, तो जनता की याददाश्त से भी उतर जाता है। फिर वही आरोपी ज़मानत पर बाहर, और समाज में “इज्ज़त” के साथ घूमते दिखते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

तो क्या हम मान लें कि यह सिर्फ़ एक बानगी है, और ऐसे न जाने कितने ही “चार्टर्ड” खेल हमारी नाक के नीचे रोज़ खेले जा रहे हैं? क्या यह व्यवस्था की लाचारी है, या फिर जानबूझकर ओढ़ी गई अज्ञानता? इस २,३९५ करोड़ के हिसाब का जवाब कब मिलेगा, या यह भी महज़ एक और अनसुलझा सवाल बनकर रह जाएगा, गुलाबी नगर की शांत शामों में गुम होता हुआ?