जयपुर संपादकीय

कोख का बाज़ार: जयपुर की बिकी हुई नैतिकता

संपादक की राय

जयपुर की चमकती दीवारों के भीतर, अब कोख भी किराए पर मिलने लगी है। और सरकार को तब होश आता है जब लिंग चयन जैसी कुप्रथाओं का दाग़ इस पवित्र रिश्ते को भी मैला करने लगता है। गुलाबी नगरी का यह नया चेहरा उतना ही कड़वा है, जितना चमकदार।

राज्य सरकार ने नौ ART (Assisted Reproductive Technology) पंजीकरण निलंबित किए हैं, कथित तौर पर सरोगेसी नियमों के ‘उल्लंघन’ के लिए। इन ‘उल्लंघनों’ में सबसे घिनौना है लिंग चयन का आरोप, जो इस पूरे खेल को केवल व्यापार से उठाकर मानवता के ख़िलाफ़ अपराध की श्रेणी में ला खड़ा करता है। सवाल यह नहीं कि नौ दुकानें बंद हुईं, सवाल यह है कि वे कब से चल रही थीं, और किसके मौन आशीर्वाद से?

गुलाबी नगरी, जो अपनी संस्कृति और सत्कार के लिए जानी जाती थी, अब मानव देह और मानवीय रिश्तों के बाज़ार में बदलती जा रही है। क्या यह हमारी आधुनिकता का नया अध्याय है, जहाँ विज्ञान का उपयोग जीवन देने की बजाय, जीवन की शर्त लगाने और लिंग चुनने के लिए हो रहा है? या यह सिर्फ़ उस खोखलेपन की निशानी है जो हमारी सामाजिक और नैतिक नींव को अंदर से खा रहा है?

कानून बने हैं, नियम भी हैं, पर क्या वे सिर्फ़ अलमारियों की शोभा बढ़ाते हैं? हर बार जब कोई बड़ा घोटाला या अमानवीय कृत्य उजागर होता है, तो हमारी प्रशासनिक मशीनरी उसी घिसी-पिटी चाल से हरकत में आती है—कुछ लाइसेंस रद्द होते हैं, कुछ बयान दिए जाते हैं, और फिर सब अगले ‘उल्लंघन’ तक गहरी नींद में सो जाते हैं। यह कैसी निगरानी है जो तब जागती है जब सब कुछ बिगड़ चुका होता है?

क्या इन ‘अस्पतालों’ के दरवाज़े पर कभी किसी ने दस्तक नहीं दी थी? क्या इन क्लीनिकों में वर्षों से चलता यह गोरखधंधा किसी की नज़र में नहीं आया, या जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया? जब तक बात अख़बारों में नहीं आती, तब तक सब ठीक है—यही हमारी व्यवस्था का अलिखित नियम है, जो भ्रष्ट्राचार और निष्क्रियता के दम पर चलता है।

यह सिर्फ़ नौ पंजीकरणों का निलंबन नहीं है, यह उस भरोसे का टूटना है जो लोगों का चिकित्सा व्यवस्था पर था। यह उस सामाजिक ताने-बाने पर प्रहार है जहाँ संतान को ईश्वरीय देन माना जाता था, न कि बाज़ार की वस्तु, जिस पर मोलभाव कर सकें या जिसकी लिंग चयन जैसी घिनौनी शर्तें रख सकें।

और इस सब के बीच, वे बेबस महिलाएँ कहाँ हैं जिनकी कोख को व्यापार का साधन बनाया गया? उनके दर्द, उनकी मजबूरियाँ, क्या इस कागज़ी कार्रवाई में कहीं दर्ज हैं? या वे भी उन अनगिनत गुमनाम चेहरों में से एक हैं, जिन्हें व्यवस्था अपनी सुविधा अनुसार भूल जाती है?

तो अगली बार जब गुलाबी शहर की चकाचौंध की बात हो, तो याद रखिएगा कि इस चमक के पीछे एक ऐसी स्याह सच्चाई भी पल रही है, जहाँ नैतिकता और इंसानियत, दोनों बिकी हुई मिलती हैं। क्या यह केवल नौ केंद्रों का अंत है, या यह उस सड़े हुए सिस्टम की महज़ एक छोटी-सी बानगी है जो अभी भी सक्रिय है, और अगले घोटाले का इंतज़ार कर रहा है?