जयपुर संपादकीय

छात्रावासों की कब्रगाह और गुलाबी शहर के सपने

संपादक की राय

जयपुर के निजी छात्रावासों में एक और छात्र की मौत। मथुरा से आया वह युवा, जो शायद जयपुर की चकाचौंध में अपने भविष्य की सीढ़ियाँ तलाश रहा था, आज एक गुमनाम आंकड़े में सिमट गया है। यह सिर्फ एक खबर नहीं, यह उस व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है, जो सपनों के शहर को मौत का मुहाना बना रही है। क्या हमने अपनी युवा पीढ़ी को बस इतना ही आश्वासन दे रखा है — आओ, पढ़ो, और अगर किस्मत खराब हुई तो गुमनामी में दम तोड़ दो?

गुलाबी नगरी, जिसे शिक्षा का केंद्र बनाने के ख्वाब बेचे जाते हैं, वह अब बिना माई-बाप के पनप रहे निजी छात्रावासों और कोचिंग सेंटरों का गढ़ बन चुकी है। इन अनगिनत इमारतों में हर साल हज़ारों छात्र आते हैं, उम्मीदों का बोझ लिए। लेकिन इन चारदीवारी के भीतर क्या चलता है, कौन उनकी निगरानी करता है, और क्या उनकी जान की कोई कीमत है, इस पर सवाल पूछने वाला कोई नहीं।

सरकारी महकमे, जो हर छोटी-बड़ी बात पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का ढोंग करते हैं, इन छात्रावासों के मामले में सदा ‘निजी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। नगर निगम से लेकर पुलिस प्रशासन तक, सबकी फाइलों में इनकी सुरक्षा और नियमों पर धूल की मोटी परत चढ़ी है। क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या फिर यह सांठगांठ का वह तंत्र है जो हर त्रासदी के बाद और मजबूत होता जाता है?

जब भी ऐसी घटना होती है, कुछ समय के लिए ‘जांच’ और ‘उच्च स्तरीय समिति’ जैसे जुमले हवा में तैरते हैं। मीडिया में दो-चार दिन सुर्खियां बनती हैं, फिर सब शांत। अगली मौत तक। इस रस्म अदायगी का नतीजा क्या निकला, आज तक किसी को नहीं पता। कागजों पर नियम बनते हैं, लेकिन ज़मीन पर वे कहीं दिखाई नहीं देते। यह शहर अब अपने छात्रों की लाशों पर खड़े होकर ‘विकास’ की गाथा लिख रहा है।

सवाल सिर्फ उस छात्र की मौत का नहीं है, सवाल उन तमाम अभिभावकों की बेचैनी का है जो अपने जिगर के टुकड़ों को इस ‘सुरक्षित’ शहर में भेजते हैं। क्या वे सिर्फ एक सर्टिफिकेट की उम्मीद में अपने बच्चों की जान जोखिम में डाल रहे हैं? क्या शिक्षा का बाज़ार इतना क्रूर हो गया है कि छात्रों की सुरक्षा अब उसकी प्राथमिकता सूची में सबसे नीचे है?

यह कोई पहली घटना नहीं है और दुखद है कि यह आखिरी भी नहीं होगी। जब तक निजी छात्रावासों की मनमानी पर लगाम नहीं लगती, जब तक सरकारी तंत्र अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझता, तब तक ऐसे कई और सपने इस शहर की गुमनाम गलियों में दम तोड़ते रहेंगे। हम कब तक इस सच्चाई से मुंह मोड़ेंगे कि हमारी ही नाक के नीचे एक पूरी पीढ़ी मौत के मुहाने पर खड़ी है?

यह शहर, जो अपनी मेहमाननवाजी और संस्कृति के लिए जाना जाता है, अब अपने युवा मेहमानों की लाशों पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। क्या हमें वाकई इस बात की परवाह है, या हमने यह मान लिया है कि कुछ जानें यूँ ही जाया होंगी, क्योंकि यह ‘व्यवस्था’ का स्वाभाविक चक्र है? शायद यह गुलाबी रंग अब खून के धब्बों से और भी गहरा हो चुका है।