जयपुर संपादकीय

पंद्रहवीं मंज़िल, एक मज़दूर: गुलाबी शहर की बेरंग हकीकत

संपादक की राय

गुलाबी नगरी की ऊंची अट्टालिकाओं की चकाचौंध में एक और ज़िंदगी गुम हो गई। पंद्रहवीं मंज़िल से गिरा एक मैकेनिक, जिसकी मौत शायद उन भव्य दरवाज़ों के अंदर बैठे लोगों की सुबह की कॉफ़ी में कोई कड़वाहट घोल भी न पाए। क्या यही हमारे शहरी विकास का असल चेहरा है, जहाँ हर नई ईंट के साथ एक मेहनतकश का जीवन दाँव पर लगता है?

यह हादसा नहीं, एक सवाल है जो सीधे हमारे उन बुलंद दावों से टकराता है जहाँ हम जयपुर को स्मार्ट सिटी बनाने की बात करते हैं। शहर की क्षितिज रेखा पर हर रोज़ एक नया ढाँचा खड़ा होता है, लेकिन उसे खड़ा करने वाले हाथों की सुरक्षा के लिए न कोई ठोस नियम दिखता है, न ही उनकी जान की कोई कीमत। क्या इन चमचमाती इमारतों में रहने वाले कभी यह सोचते हैं कि उनकी आरामदायक ज़िंदगी के लिए कितनों ने अपनी जान दाँव पर लगाई है?

समाचारों की एक छोटी सी कतरन, एक आँकड़ा, और फिर सब पहले जैसा। शहर के ट्रैफिक में, बाज़ारों की भीड़ में, और सत्ता के गलियारों में, किसी को कहाँ फुरसत कि इस ‘छोटी सी’ घटना पर ठहर कर सोचे। एक एयर कंडीशनर सुधारने गया था, आज उस मैकेनिक की ज़िंदगी ही ‘कूल’ हो गई। यह कैसी विडंबना है कि सुविधाओं को सुधारते-सुधारते खुद ज़िंदगी ही बेसुध हो जाए?

श्रम विभाग कहाँ है? सुरक्षा के मानक कागज़ों में क्यों कैद हैं? ठेकेदार और बिल्डर, जो इन परियोजनाओं से करोड़ों कमाते हैं, उनकी ज़िम्मेदारी कब तय होगी? शायद तब, जब किसी ‘खास’ का कोई अपना इस बेपरवाही का शिकार बनेगा। तब तक, गरीब मज़दूरों का खून इन अट्टालिकाओं की नींव में सीमेंट के साथ मिलकर सूखता रहेगा।

कभी राजा-महाराजाओं के दौर में इंसानों को ईंट-पत्थर ढोने का हुक्म होता था, आज लोकतंत्र में भी उनकी हैसियत में कितना बदलाव आया है? बस अब गुलामी का नाम ‘अनुबंध’ है और मज़दूरी का नाम ‘आत्मनिर्भरता’। जयपुर अपनी विरासत पर गर्व करता है, लेकिन क्या हम कभी उन लोगों की ज़िंदगी को भी ‘विरासत’ का दर्जा देंगे, जिनकी मेहनत से यह शहर खड़ा है?

हर घटना के बाद जाँच के आदेश, मुआवज़े की घोषणाएँ, और फिर चुप्पी। ये सरकारी लीपापोती अब इतनी पुरानी हो चुकी है कि इसमें कोई नयापन नहीं बचा। अधिकारी आएंगे, दो बातें कहेंगे, और फिर फ़ाइलें उसी धूल में दब जाएंगी जहाँ पिछले हादसों की फ़ाइलें पड़ी हैं। क्या हमारी व्यवस्था सिर्फ़ लाशों पर राजनीति करने के लिए बनी है?

कब तक चलता रहेगा यह सिलसिला? कब तक हम विकास की इस अंधी दौड़ में इंसानी ज़िंदगियों की आहुति देते रहेंगे? या फिर, हमारे लिए ‘विकास’ का मतलब सिर्फ़ कंक्रीट के जंगल और चकाचौंध है, चाहे उसके नीचे कितने ही ‘गुलाब’ कुचल दिए जाएँ? इस सवाल का जवाब शायद उस पंद्रहवीं मंज़िल से कभी नहीं मिलेगा, जहाँ से एक ज़िंदगी गिरकर ख़त्म हो गई।