जयपुर संपादकीय

सांगानेर के स्कूल: सत्ता की कसौटी

संपादक की राय

शीर्षक: मुख्यमंत्री के आंगन में शिक्षा का मातम

गुलाबी नगरी की चमक-दमक के पीछे सांगानेर के सरकारी स्कूलों की टूटी दीवारें और बदहाल शौचालय, क्या यही है ‘बदलाव’ का वो चेहरा जिसकी नुमाइश की जाती है? जब मुखिया के अपने ही क्षेत्र में नौनिहालों का भविष्य धूल फांक रहा हो, तो दूर-दराज के गाँवों की कौन सुध लेगा, यह सवाल अब सिर्फ़ सवाल नहीं, एक ठिठोली बनकर रह गया है।

उन क्लासरूम्स की कल्पना कीजिए जहाँ छत कभी भी सिर पर आ सकती है, और बच्चे हर घड़ी एक अनजाने ख़तरे के साए में बैठे हों। पीने का पानी टैंकरों के भरोसे, और शौचालय ऐसे कि बीमारियाँ खुद दावत पर आ जाएँ। यह बुनियादी सुविधाएँ नहीं, यह बच्चों का मानवीय अधिकार है, जो सत्ता के सबसे नज़दीक होकर भी उनसे छीन लिया गया है।

वर्षों से शिकायतों का पुलिंदा बढ़ता गया, कागज़ों पर धूल जमती गई, मगर न कोई सुनवाई हुई, न कोई सुधार। क्या यह मान लिया जाए कि अधिकारी वर्ग ने अपने कानों में तेल डाल रखा है, या फिर उन्हें यह अहसास ही नहीं कि सरकारी दफ़्तरों की फाइलों से कहीं ज़्यादा ज़रूरी ज़मीन पर खड़ी बदहाली है?

और फिर हम बातें करते हैं ‘शिक्षा क्रांति’ की, ‘नवाचार’ की, और ‘डिजिटल क्लासरूम’ की। वाह! एक तरफ़ बच्चों को साफ़ पानी और सुरक्षित छत नसीब नहीं, दूसरी तरफ़ बड़े-बड़े मंचों से सुनहरे भविष्य के राग अलापे जाते हैं। यह कैसी विडंबना है, जहाँ ज़मीनी हकीकत और सरकारी प्रचार के बीच एक गहरी खाई बन गई है।

यह केवल कुछ ईंटों और पानी की समस्या नहीं है। यह सरकारी तंत्र की उस संवेदनहीनता का प्रमाण है जो अक्सर सत्ता के गलियारों में पनपती है। मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में भी अगर सरकारी स्कूल ऐसी दुर्दशा में हैं, तो यह सीधे-सीधे उस प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़ा करता है जिसे जनता की समस्याओं के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

गुलाबी नगर की दोहरी ज़िंदगी का यह एक और काला सच है। एक तरफ़ भव्य इमारतें, चमचमाती सड़कें और विकास के नारे, दूसरी तरफ़ वो सरकारी स्कूल जहाँ बच्चों को रोज़ अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा की सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। क्या मुख्यमंत्री जी को अपने ही घर के आंगन में पसरा यह अंधेरा दिखाई नहीं देता?

जब व्यवस्था खुद ही अपने बच्चों के प्रति इतनी लापरवाह हो जाए, तो फिर किस विकास, किस प्रगति की बात की जा सकती है? सांगानेर के ये स्कूल केवल इमारतें नहीं हैं, वे हमारे भविष्य की नींव हैं, और अगर यह नींव ही इतनी कमज़ोर होगी, तो फिर किस आलीशान इमारत के खड़े होने का सपना देखा जा रहा है?