जयपुर संपादकीय — 30 August 2026
चुनाव से पहले नकली नोटों का ट्रायल: ये जयपुर है, जनाब!
संपादक की राय
चुनाव से पहले नकली नोटों का ‘ट्रायल’ — यह शब्द सुनते ही किसी के दिमाग में क्या तस्वीर बनती है? गुलाबी शहर की चकाचौंध में, जहाँ लोग कला और संस्कृति के चर्चे करते हैं, वहीं गलियों के भीतर सत्ता के पुजारी ‘लोकतंत्र’ के नए प्रयोगों में लीन हैं। क्या यही है हमारी चुनावी तैयारी का नया आयाम?
जिस शहर में बच्चे स्कूल में देशभक्ति और ईमानदारी के पाठ पढ़ते हैं, उसी शहर के राजनीतिक गलियारों के ठीक बाहर, कुछ लोग नेपाल से लाए गए नकली नोटों की परख कर रहे थे। ‘परीक्षण’ की बात हो रही थी, जैसे कोई नया उत्पाद बाज़ार में उतारने से पहले गुणवत्ता जाँचता है। क्या हमारी ‘जनसेवा’ की गुणवत्ता भी अब नकली कागज़ के टुकड़ों पर निर्भर करने लगी है?
यह सिर्फ़ एक गिरोह भर की करतूत नहीं, यह उस बदबूदार दलदल का एक छोटा सा कतरा है जहाँ लोकतंत्र के नाम पर हर चुनाव से पहले सौदेबाज़ी की फसल काटी जाती है। जब गली के नुक्कड़ पर खड़े होने वाले पार्षद तक को ‘चुनाव फंड’ के नाम पर लाखों फूंकने पड़ते हों, तब यह समझना मुश्किल नहीं कि कौन सी ‘अर्थव्यवस्था’ इन चुनावों को चला रही है।
कानून के रखवालों के लिए यह शायद एक और ‘केस’ होगा, लेकिन आम नागरिक के लिए यह एक खुली चुनौती है। इस बेफ़िक्री का क्या करें? नकली नोटों के साथ ‘ट्रायल’ करने की हिम्मत तब आती है, जब पकड़े जाने का डर कम और सिस्टम को अपनी मुट्ठी में रखने का गुमान ज़्यादा हो। क्या यह सिर्फ़ गुमान है, या हक़ीक़त?
पिंक सिटी की साख पर एक और दाग। बाहर से आने वाले पर्यटक यहाँ की विरासत, यहाँ की वास्तुकला से मोहित होते हैं, लेकिन शहर के भीतर की ये ‘कलाएँ’ क्या संदेश देती हैं? एक तरफ़ शानो-शौकत के किस्से, दूसरी तरफ़ नोटों की नकली गड्डियों से वोटों को खरीदने की साज़िशें। यह दोहरापन अब कितना और गहरा होगा?
और हम? हम इस पूरे खेल को तमाशे की तरह देखते हैं। कभी अफ़सोस जताते हैं, कभी बहस करते हैं, फिर भूल जाते हैं। यह आपराधिक प्रवृत्ति चुनावों का स्थायी हिस्सा क्यों बन गई है? क्या हम इतने आदी हो गए हैं कि अब हमें इसमें कोई ‘गंभीर’ गड़बड़ नज़र ही नहीं आती? या हमारी उदासीनता ही उन्हें और बेख़ौफ़ बनाती है?
जब चुनाव सिर्फ़ जीतने का ज़रिया बन जाएं और जीत के लिए हर हथकंडा जायज़ मान लिया जाए, तब लोकतंत्र का ‘असली’ मूल्य क्या बचता है? क्या अगला चुनाव सिर्फ़ ‘नकली’ वादों और ‘नकली’ नोटों के बीच की जंग होगी? गुलाबी शहर, अब शायद गुलाबी नहीं, कुछ और ही रंग दिखा रहा है।