जयपुर संपादकीय

जयपुर की बिजली, डॉक्टरी का पहला सबक

संपादक की राय

हज़ारों नौजवान, डॉक्टर बनने का सपना लिए जयपुर के इम्तिहान केंद्रों पर पहुंचे थे। उम्मीद थी कि उनका भविष्य रोशन होगा, मगर उन्हें नसीब हुई सिर्फ़ काली रात। जिस शहर में हर साल करोड़ों के महोत्सव होते हैं, बड़े-बड़े सम्मेलनों की शान बघारी जाती है, वहां एक मेडिकल परीक्षा के दौरान बिजली गुल हो जाती है। क्या हमारे भावी डॉक्टरों के लिए व्यवस्था का पहला पाठ यही है – कि रोशनी कब बुझ जाए, कोई नहीं जानता?

फिर तुरंत ही सरकारी तंत्र का वो चिर-परिचित ढोंग शुरू हुआ। पहले फुसफुसाहट उड़ी कि कहीं पेपर तो लीक नहीं हो गया, जैसा कि अब हर बड़ी परीक्षा का शगुन बन चुका है। लेकिन नहीं! सूचना ब्यूरो ने तुरंत ही स्पष्टीकरण जारी कर दिया कि ये खबरें “भ्रामक” हैं। असल में, बस बिजली चली गई थी। जैसे बिजली का जाना कोई सामान्य “तकनीकी खराबी” नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आपदा हो, जिस पर पर्दा डालना ज़रूरी था।

और जब समस्या इतनी सीधी-सादी हो – बिजली का जाना – तब सबसे जटिल उपाय क्यों ढूंढा जाता है? जवाब है: जांच समिति। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज ने तीन सदस्यों की एक समिति गठित की है, जो इस बात की जांच करेगी कि भला बिजली कैसे गुल हो गई। क्या इसमें भी कोई गहरी साज़िश निकलेगी, या बस इतना कि कोई तार ढीला था, कोई रखरखाव नहीं हुआ, या लोड लेने की क्षमता ही नहीं थी? इस सवाल का जवाब देने के लिए तो मोहल्ले का एक मामूली इलेक्ट्रीशियन भी काफी था, लेकिन उसे भला कौन पूछता!

दोबारा परीक्षा। 2,445 छात्रों के लिए। सोचिए, एक छात्र जो दूर-दराज से आया, जिसने रातें जागकर पढ़ाई की, जिसने तनाव और उम्मीद के बीच खुद को झोंक दिया, उसे अब फिर से वही अग्निपरीक्षा देनी होगी। उसकी जेब से लगे पैसे, उसका बीता समय, उसका मानसिक दबाव — क्या ये सब किसी “तकनीकी खराबी” का छोटा सा हिसाब हैं? या व्यवस्था ने तय कर लिया है कि छात्रों का भविष्य उसकी उदासीनता का सबसे आसान शिकार है?

यह सिर्फ एक परीक्षा केंद्र का मामला नहीं है, यह उस व्यवस्था की तस्वीर है जो अपनी आधारभूत ज़रूरतों को भी पूरा करने में अक्षम है। हम चांद पर पहुंचने की बात करते हैं, डिजिटल इंडिया के नारे लगाते हैं, लेकिन राजधानी जयपुर में, जहाँ लाखों लोग रहते हैं, एक परीक्षा के दौरान बिजली का निर्बाध रहना सुनिश्चित नहीं कर पाते। क्या हम अब भी ‘इन्वर्टर युग’ में जी रहे हैं, जहाँ हर महत्वपूर्ण काम के लिए बैकअप की उम्मीद करनी पड़ती है?

यह घटना एक अकेली मिसाल नहीं। हर कुछ महीनों में किसी न किसी परीक्षा के साथ खिलवाड़ होता है, कभी लीक के नाम पर, कभी तकनीकी बहाने से। और हर बार वही ढर्रा – जांच, आश्वासन, और फिर कुछ समय बाद, अगली गलती का इंतज़ार। क्या यह मान लिया जाए कि हमारे देश में शिक्षा और परीक्षा का मतलब ही अब अनिश्चितता और दोहराव हो गया है?

तो इन भावी डॉक्टरों को हम क्या सिखा रहे हैं? कि जिस सिस्टम में उन्हें काम करना है, वह कभी भी अंधेरे में डूब सकता है? कि उनकी मेहनत से ज़्यादा मायने “तकनीकी खराबी” और सरकारी समितियों के बहाने रखेंगे? या सिर्फ़ इतना कि इस देश में हर सपना एक दिन बिजली के कट की तरह अचानक बुझ सकता है? जवाब चाहे जो भी हो, गुलाबी शहर में यह काली सच्चाई सिर्फ़ चुभती नहीं, डराती भी है।