जयपुर संपादकीय

भैंसों के बाड़े वाला स्कूल: यह जयपुर है, या कोई मज़ाक़

संपादक की राय

गुलाबी नगरी की चमक-दमक के दावों के बीच, क्या हमें सचमुच पता था कि हमारे भविष्य की बुनियाद, यानी बच्चों का स्कूल, किसी भैंस के बाड़े में साँसें ले रहा था? यह तस्वीरें किसी पिछड़े गाँव की नहीं, बल्कि जयपुर के ठीक पास के एक प्राथमिक विद्यालय की हैं, जहाँ ज्ञान के दीये की लौ भैंसों की लीद और बदबू के बीच टिमटिमा रही थी। क्या हमारे शिक्षा मंत्री और अधिकारी इन ‘दृश्यम’ जैसे दृश्यों से वाकिफ़ नहीं थे, या उन्हें इसमें कोई समस्या नज़र ही नहीं आई?

अजीब विडंबना है कि इस ‘शिक्षा मंदिर’ पर कुदाल तब चली, जब किसी नागरिक समूह ने मुहिम चलाई और निरीक्षण करने आई टीम को अपनी सुरक्षा का ख़तरा महसूस हुआ। बच्चों की सुरक्षा और उनके भविष्य पर कोई जोखिम नहीं था? सालों से जो बच्चे गंदगी और जानवरों के बीच पढ़ने को मजबूर थे, उनकी तकलीफ़ किसी को नहीं दिखी? क्या यह शहर इतना असंवेदनशील हो गया है कि सरकारी तंत्र की नींद हिलाने के लिए किसी अफ़सर की कुर्सी या इज़्ज़त पर आँच आना ज़रूरी है?

हम किस ‘स्मार्ट सिटी’ की बात करते हैं, जब राजधानी के नज़दीक ही एक स्कूल को सिर्फ़ इसलिए गिराया जाता है क्योंकि वह भैंसों का ‘साझा’ ठिकाना बन चुका था? यह कौन सा विकास मॉडल है, जहाँ नींव ही इतनी कच्ची है कि बच्चों को मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं? विधायक कोष से अब नई इमारत बनाने की बात हो रही है। यह कोष पहले कहाँ सोया हुआ था, जब बच्चे भैंसों के बीच बैठ कर ‘क ख ग’ सीख रहे थे?

सरकारी कागज़ों पर शिक्षा का अधिकार और सर्व-शिक्षा अभियान की रंगीन योजनाएँ बड़े-बड़े अक्षरों में छपी मिलती हैं। ज़मीनी हकीकत तो यह है कि हमारे बच्चे आज भी उस माहौल में पढ़ रहे हैं, जहाँ जानवरों को भी शायद बेहतर सुविधाएँ मिल जातीं। यह कोई एक दिन की लापरवाही नहीं, यह बरसों की अनदेखी और उदासीनता का जीता-जागता सबूत है।

यह केवल एक स्कूल की जर्जर हालत का मामला नहीं, यह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन का प्रतीक है। जिस देश में बच्चों को भगवान का रूप कहा जाता है, उसी देश में उनके स्कूल को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। अब जब स्कूल गिरा दिया गया है, बच्चे अस्थायी रूप से किसी निवासी के घर में पढ़ रहे हैं। क्या यह व्यवस्था का समाधान है, या बस एक और खानापूर्ति, जिससे कुछ समय के लिए सुर्खियाँ शांत हो जाएँ?

इस पूरे प्रकरण पर बस एक सवाल उठता है, क्या गुलाबी शहर की यह दोहरी ज़िंदगी ही हमारी नियति है? एक तरफ़ आलीशान महल, पाँच सितारा होटल और पर्यटन के भव्य दावे, और दूसरी तरफ़ हमारे नौनिहालों के लिए बदबूदार भैंसों का बाड़ा। यह कैसी तस्वीर है, जो हम आने वाली पीढ़ी को सौंप रहे हैं? क्या शिक्षा के इस मज़ाक का कोई अंत नहीं?