जयपुर संपादकीय

पड़ोस की दहलीज पर दरिंदगी

संपादक की राय

जयपुर की गलियों में अब सुबह की धूप भी बेमानी लगने लगी है, जब खबर आती है कि एक स्कूल छात्रा को उसके ही पड़ोसी ने हैवानियत का शिकार बनाया। क्या अब हम अपने बच्चों को घर की चारदीवारी में भी सुरक्षित मान लें, जब पड़ोस की आड़ में भेड़िए घात लगाए बैठे हों? यह सिर्फ एक अपराध नहीं, हमारे सामाजिक ताने-बाने पर लगा वो घाव है, जो सदियों के विश्वास को पल भर में चीर जाता है।

कोई एक बार का वहशीपन होता, तो शायद खुद को तसल्ली दी जा सकती थी कि यह एक क्षणिक वहम था। मगर यहां तो सिलसिला था—धमकी, ब्लैकमेल और पैसे ऐंठने का। यह सिर्फ जिस्मानी चोट नहीं, यह रूह को भीतर तक गलाने की साजिश है, जिसमें दहशत को हथियार बनाकर मासूमियत का हर दिन खून किया जाता है। किस उम्मीद पर वह बच्ची घर लौटेगी, जब उसे पता है कि अगली गली में, अगले दरवाजे के पीछे एक शिकारी उसका इंतज़ार कर रहा है?

और हम? हम वही शहर हैं जो सुबह योग करते हैं, शाम को आरती में लीन होते हैं और रात को मेहमाननवाजी के किस्से सुनाते हैं। क्या हमें कभी फुर्सत मिली यह सोचने की कि हमारे ही बीच, हमारे ही पड़ोसी का मुखौटा पहनकर कौन घूम रहा है? या फिर हम इतने अभ्यस्त हो गए हैं ऐसी खबरों के कि अब यह सिर्फ एक और ‘सामान्य’ घटना बन कर रह गई है?

जब एक घर की इज्जत, एक बच्ची का बचपन, एक पड़ोसी के दरिंदगी भरे खेल की भेंट चढ़ जाए और वह खेल पैसे की वसूली तक पहुंच जाए, तो हम किस ‘संस्कृति’ की बात करते हैं? क्या यही वह ‘हमारा जयपुर’ है, जिसका गुणगान हर सरकारी पर्चे और हर पर्यटन विज्ञापन में होता है? वह पोस्टर जहां मुस्कुराते चेहरे, चमकती हवेलियां और लोक कला की छटा होती है, क्या कभी उसके पीछे की इस भयावह सच्चाई को भी दर्शाएगा?

यह सिर्फ एक बच्ची का मामला नहीं है। यह उन अनगिनत चुप्पी का बोझ है, जो ऐसे ही डर और ब्लैकमेल के जाल में फंसी होंगी। कौन जानता है, हमारे ही पड़ोस की कितनी गलियों में, कितनी मासूम आंखें किसी पड़ोसी के खौफ से हर रात सूख जाती होंगी? कौन जानता है, कितनी जिंदगियां बिना बोले, बिना विरोध किए, ऐसे ही घुट-घुट कर खत्म हो रही होंगी?

सवाल सिर्फ अपराधी को पकड़ने का नहीं है। सवाल उन आंखों पर पड़ी पट्टी का है, जो अपने ही घर के पास पलते इस जहर को देख नहीं पातीं। सवाल उस समाज का है, जो ‘अपने’ और ‘पराए’ के बीच की रेखा को भी नहीं समझ पाता और जहां ‘अपने’ ही भेड़ियों में बदल जाते हैं। यह कैसी गुलाबी नगरी है, जिसकी मिट्टी पर अब ऐसे स्याह धब्बे गहरे होते जा रहे हैं, और हम बस अपनी आंखें फेर लेते हैं?