जयपुर संपादकीय — 5 September 2026
चरित्र का सवाल, इंसानियत का जनाज़ा
संपादक की राय
अभी तक हमारी गुलाबी नगरी की पहचान उसके ऐतिहासिक सौंदर्य, मेहमानवाज़ी और राजसी शान से होती थी। अब शायद एक नया चिह्न भी जोड़ लेना चाहिए – उस बेबस स्त्री का नग्न शरीर, जिसे भीड़ ने ‘चरित्र’ पर संदेह के नाम पर नोचा और अपमानित किया। क्या यह वही राजस्थान है, जहाँ वीरांगनाओं के किस्से सुनाए जाते हैं, या यह वह नया भारत है जहाँ न्याय से पहले सड़क पर ही ‘चरित्र प्रमाण पत्र’ फाड़ दिया जाता है?
उस भीड़ को क्या अधिकार था, उस बेड़ी में जकड़ी मानसिकता को क्या साहस मिला, कि वह किसी की आबरू को अपने अमानवीय संदेह की भेंट चढ़ा दे? यह सिर्फ़ कुछ सिरफिरों का काम नहीं, यह उस विकृत सोच का नंगा प्रदर्शन है जो आज भी स्त्री को अपनी जागीर समझती है। ‘चरित्र पर संदेह’ – क्या यह एक खुला निमंत्रण है क्रूरता के इस खेल को खेलने का, जहाँ हर गली-नुक्कड़ पर पंचायत लग जाती है और भीड़ ही न्यायधीश, जल्लाद और गवाह बन जाती है?
हर बार की तरह, कुछ ‘गिरफ्तारियां’ हुई हैं। प्रशासन की फाइल में यह एक और ‘केस’ बन गया। लेकिन क्या इन गिरफ्तारियों से उस आत्मा पर लगे ज़ख्म भर जाएंगे? क्या उस महिला की चीख़ें थम जाएंगी, जो उस भीड़ के सामने अपनी इज़्ज़त के लिए तड़प रही थी? यह कैसी त्वरित कार्रवाई है जो घटना के बाद तो फुर्ती दिखाती है, लेकिन ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए अपनी आँखें बंद रखती है?
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारों की गूँज आज भी फिज़ा में तैर रही है, पर उस गूँज में अब शर्मिंदगी की एक और परत जुड़ गई है। हम किस बेटी को बचाने की बात करते हैं जब हमारे अपने ही समाज में, दिन-दहाड़े, ‘चरित्र’ के नाम पर किसी की इज़्ज़त को तार-तार किया जाता है? क्या हमारी संस्कृति की सारी मर्यादाएँ केवल किताबों तक ही सीमित हैं, और व्यवहार में हम पाषाण युग से भी बदतर हो गए हैं?
यह घटना सिर्फ़ एक महिला पर हमला नहीं, यह हमारी सामूहिक चेतना पर हमला है। यह उन सभी दावों की धज्जियाँ उड़ाती है जो हम ‘प्रगतिशील समाज’ होने के बारे में करते हैं। हमें खुद से पूछना होगा – क्या हमारा समाज इतना खोखला हो गया है कि वह ‘संदेह’ और ‘अफवाह’ को हिंसा का लाइसेंस बना दे? क्या हम सचमुच उस ‘इज्जत’ के लायक हैं, जिसका ढोंग हम हर रोज़ करते हैं?
गुलाबी नगरी के दमकते चेहरे के पीछे, ये काली परछाइयाँ कब तक छिपी रहेंगी? जब तक हम इस क्रूर मानसिकता की जड़ों को नहीं पहचानेंगे, तब तक ऐसी घटनाएँ सिर्फ़ हेडलाइन बनकर आती-जाती रहेंगी। और हर बार, यह ‘चरित्र पर सवाल’ हमारी इंसानियत का जनाज़ा उठाता रहेगा, सरेआम।