जयपुर संपादकीय — 6 September 2026
गुलाबी नगर में काली बगावत
संपादक की राय
एक दृश्य जो गुलाबी नगरी की दीवारों पर कालिख पोत गया: एक माननीय विधायक की गाड़ी को घेरती आक्रोशित भीड़, हाथों में काले झंडे, और जुबां पर कड़वे बोल। यह कोई इत्तेफाक नहीं, यह उस जनता का जवाब है जिसने कभी इन हाथों में गुलाब थमाए थे। आज वही हाथ विरोध की मशाल बने हैं, अपनी ही सरकारों से सवाल पूछ रहे हैं।
जयपुर की सड़कों पर यह नजारा उस झूठे आईने को तोड़ता है, जिसमें हमारे चुने हुए नुमाइंदे अपनी लोकप्रियता का चेहरा देखा करते थे। सवाल यह नहीं कि झंडे क्यों लहराए गए, सवाल यह है कि उस गुस्से की जड़ें कितनी गहरी हैं, जो अब सड़क पर आकर उबल रहा है। क्या यह सिर्फ एक नेता का विरोध है, या पूरी व्यवस्था के खिलाफ जनता का सामूहिक हुंकार?
वर्षों से यही चलता आ रहा है। चुनाव से पहले नेताजी हाथ जोड़ते हैं, विकास के सुनहरे सपने दिखाते हैं, और जब कुर्सी मिल जाती है, तो वही हाथ जनता की पहुँच से परे हो जाते हैं। ‘मैं आपका सेवक हूँ’ का राग तब तक ही अलापा जाता है, जब तक वोट बैंक सुरक्षित रहे। फिर सेवक कब स्वामी बन बैठता है, पता ही नहीं चलता।
कितनी विडंबना है कि जिस शहर में बड़े-बड़े भव्य कार्यक्रम होते हैं, जहाँ विदेशी मेहमानों के स्वागत में पलकें बिछाई जाती हैं, वहीं की जनता अपने ही प्रतिनिधियों से मिलने को तरसती है। और जब मिलती है, तो स्वागत फूलों से नहीं, काली झंडियों से होता है। यह तस्वीर बताती है कि जमीन पर हकीकत क्या है और सरकारी कागजों में क्या।
यह सिर्फ विरोध नहीं, यह उस भरोसे की मौत है जो लोकतंत्र की बुनियाद है। जब जनता को लगता है कि उसकी आवाज़ अनसुनी हो रही है, उसकी समस्याएँ कचरे के ढेर में बदल रही हैं, तो उसके पास सड़क पर उतरने के अलावा क्या विकल्प बचता है? क्या हमारे राजनेताओं को इस चीख में सिर्फ ‘राजनीतिक साजिश’ दिखती है, या वे अपने गिरेबान में झाँकने का साहस भी रखते हैं?
इस घटना ने एक बात तो साफ कर दी है: जनता अब चुपचाप तमाशा देखने वाली भीड़ नहीं रही। वह सवाल पूछती है, हिसाब माँगती है, और जब उसे नहीं मिलता तो अपने तरीके से जवाब देती है। यह वह जनता है, जो अपने बच्चों के भविष्य, पानी की किल्लत, टूटी सड़कों और सरकारी दफ्तरों की अकर्मण्यता से जूझती हुई हर दिन अपनी लड़ाई लड़ रही है।
तो क्या यह माना जाए कि गुलाबी नगर में अब नेताओं का स्वागत इसी तरह होगा? क्या यह काली स्याही अब हमारे लोकतांत्रिक उत्सवों का नया रंग बनेगी? जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी जनता से इतना कट जाएँगे कि उनके पास सिर्फ़ अपनी सुरक्षा का घेरा और सरकारी गाड़ियाँ बचेंगी, तब क्या बचेगा इस पूरे तंत्र में? एक असहज सवाल, जिसकी गूँज दूर तक जानी चाहिए।