जयपुर संपादकीय — 7 September 2026
आधी रात, आम आदमी, और अफ़सरशाही का डंडा
संपादक की राय
जयपुर की गुलाबी सड़कों पर रात ढलते ही एक अजीबोगरीब दृश्य सामने आया। एक आम नागरिक, अपने वाहन में सवार, अचानक खुद को किसी लुटेरे नहीं, बल्कि खाकी वर्दी और सरकारी डंडे के सामने पाता है। ये ‘लूटना’ नहीं, ‘ज़ब्त करना’ था। लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव को सफल बनाने के नाम पर, क्या अब आधी रात को निजी संपत्ति पर डाका डालना ही सबसे सीधा रास्ता बचा है?
यह सिर्फ एक गाड़ी की बात नहीं। यह उस मानसिकता का प्रतीक है जहाँ ‘सरकार’ का अर्थ सेवा नहीं, बल्कि हुक्म होता है। चुनावों के लिए वाहनों की व्यवस्था करना, क्या इतनी तुच्छ और अंतिम क्षण की योजना का विषय है कि अधिकारियों को सड़कों पर ‘शिकार’ करना पड़े? जिस व्यवस्था को नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा के लिए होना चाहिए, वह खुद उनके लिए भय का सबब बन जाए, इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा?
डिजिटल इंडिया के नारे, ई-गवर्नेंस के दावे और ‘इज़ ऑफ लिविंग’ की मीठी बातें, जब इस तरह की ज़मीनी हकीकत से टकराती हैं, तो उनका खोखलापन उजागर हो जाता है। गुलाबी नगर की चकाचौंध के नीचे, एक सामंती सोच अब भी पल रही है, जहाँ सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी सुविधा के लिए किसी की भी निजता और संपत्ति को ताक पर रख सकते हैं।
परिवहन विभाग के बाबुओं को क्या यह सिखाया जाता है कि जब काम न बने, तो डंडा उठाओ? यह कौन सा लोकतांत्रिक तरीका है जहाँ एक नागरिक को मतदान जैसे पवित्र कार्य के लिए अपनी निजी संपत्ति जबरन देनी पड़े? यह केवल एक गाड़ी नहीं, यह नागरिक के विश्वास और गरिमा को ज़ब्त करने का प्रयास है, जिसके बाद वह सिस्टम पर भरोसा करना छोड़ देता है।
कल्पना कीजिए उस व्यक्ति की, जिसे रात के अंधेरे में रोककर उसकी गाड़ी छीनने का प्रयास किया गया। आपातकाल में जाना हो, बीमार को अस्पताल ले जाना हो, या कोई निजी ज़रूरी काम हो — सरकारी फरमान के आगे सब बेमानी। नागरिकों की असुविधा, उनका समय, उनकी योजनाएँ, यह सब सत्ता के लिए मात्र एक बाधा है, जिसे आसानी से रौंदा जा सकता है।
यह घटना अकेली नहीं है। यह सरकारी विभागों में व्याप्त कुप्रबंधन, संसाधनों की कमी और सबसे बढ़कर, जवाबदेही की पूर्ण अनुपस्थिति का सूचक है। चुनाव आयोग से लेकर स्थानीय प्रशासन तक, क्या किसी के पास यह सवाल उठाने का साहस नहीं कि हर बार, आखिर क्यों चुनावों का बोझ आम आदमी की निजी संपत्ति पर लादा जाता है?
तो क्या यही है हमारा “लोकतंत्र”? जहाँ मतदान के दिन जश्न से पहले, आम आदमी को अपनी गाड़ी बचाने की लड़ाई लड़नी पड़े? जहाँ “जनता के सेवक” खुद को जनता का मालिक समझने लगें? यह प्रश्न सिर्फ गुलाबी नगर की सड़कों पर नहीं, बल्कि हमारे समूचे तंत्र की आत्मा पर एक असहज चुप्पी बनकर छाया हुआ है।