जयपुर संपादकीय — 8 September 2026
हुक्मनामा कहाँ? जनाब, हुक्मनामा कहाँ?
संपादक की राय
पिंक सिटी की सड़कों पर आज एक नया तमाशा देखने को मिला। एक परिवार अपनी गाड़ी, अपनी निजी संपत्ति को बचाने के लिए सरकारी अमले के सामने खड़ा था, हाथ जोड़े नहीं, बल्कि अधिकार मांगते हुए: “हुक्मनामा कहाँ है?” वाह रे सरकारी तंत्र! चुनाव की ड्यूटी के नाम पर किसी की निजी गाड़ी यूं ही उठा लेने का यह कैसा अधिकार है, जिसके लिए एक साधारण सा आदेश पत्र तक दिखाना ज़रूरी नहीं समझा जाता? क्या चुनाव लोकतंत्र का पर्व है या निजी वाहनों की लूट का खुला लाइसेंस?
यही वो मुस्तैदी है, यही वो तत्परता है, जो जनता को अपनी रोज़मर्रा की समस्याओं में कभी नज़र नहीं आती। जब सड़क पर गड्ढे हों, बिजली गुल हो, या पीने का पानी न आए, तब यही विभाग और उनके अधिकारी कागज़ी कार्रवाई के नाम पर महीनों टालमटोल करते फिरते हैं। लेकिन चुनाव की घोषणा हुई नहीं कि रातों-रात अफ़सरशाही में हिटलर की आत्मा का संचार हो जाता है। अब हर गाड़ी, हर घर, हर नागरिक सिर्फ एक संसाधन है, जिसे अपनी मर्ज़ी से झोंका जा सकता है।
सोचिए ज़रा, यह कैसा ‘शासन’ है जो अपनी ही जनता से उसकी संपत्ति छीनने के लिए कोई लिखित आदेश देना भी अपनी शान के ख़िलाफ़ समझता है? क्या यह मान लिया गया है कि नागरिक केवल शासित होने के लिए हैं, सवाल पूछने के लिए नहीं? क्या यह उस ‘व्यवस्था’ का प्रतिबिंब नहीं, जहाँ मौखिक फ़रमान ही सबसे बड़ा संविधान बन जाता है, और जनता को चुपचाप सिर झुकाकर हर हुक्म बजा लाना होता है?
यह सिर्फ एक Hilux गाड़ी की बात नहीं है। यह उस सामंती मानसिकता की बात है जो गुलाबी नगरी के आधुनिक चोले के नीचे अब भी धड़कती है। जहाँ सत्ता के गलियारों में बैठे लोग खुद को जनता का मालिक समझने की भूल कर बैठते हैं, और यह भूल अक्सर अराजकता का रूप ले लेती है। “हम सरकार हैं, हम जो चाहें कर सकते हैं,” यह अहंकार ही तो है जो ज़ुबान पर हर दूसरे दिन सुनाई देता है।
क्या यही वह ‘सुशासन’ है जिसका ढोल पीटा जाता है? एक तरफ डिजिटल इंडिया, पारदर्शिता और जवाबदेही के वादे और दूसरी तरफ़ एक अदद सरकारी आदेश के लिए आम आदमी को दो घंटे तक सड़क पर मोर्चा संभालना पड़ता है। यह कैसा विरोधाभास है? क्या हमारी प्रशासनिक ट्रेनिंग में यह सिखाया जाता है कि जब भी किसी से उसकी निजी संपत्ति लेनी हो, तो नियम-क़ानून और कागज़ात को ताक पर रख दिया जाए?
यह घटना सिर्फ़ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर एक गहरा सवालिया निशान है। अगर चुनाव की तैयारी इतनी ही लचर और मनमानी पर आधारित है, जहाँ अधिकारियों को अपना काम करने के लिए बुनियादी दस्तावेज़ों की भी ज़रूरत नहीं पड़ती, तो फिर किस तरह के निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद की जा सकती है? क्या यह जनता को यह संदेश नहीं देता कि नियमों का पालन सिर्फ़ उसके लिए है, ‘सरकार’ के लिए नहीं?
इस शहर की सड़कें, जो बड़े-बड़े दावों और वादों की गवाह रही हैं, आज एक और कड़वी सच्चाई की गवाह बनी हैं। जब सत्ता को किसी चीज़ की ज़रूरत होती है, तो वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल कर लेती है – चाहे उसके लिए नियमों को ताक पर रखना पड़े और नागरिकों को अपमानित करना पड़े। जनाब, हुक्मनामा कहाँ है? या अब यह सवाल पूछने की हिम्मत भी नहीं बची?