जयपुर संपादकीय

तेरहवीं मंज़िल का अंतिम ‘सेल्फ़ी’

संपादक की राय

जयपुर की तेरहवीं मंज़िल से गिरे उस नौजवान की कहानी कोई इकलौती घटना नहीं, बल्कि हमारे समय का एक भयावह प्रतीक है। एक क्षणिक तस्वीर, एक ‘लाइक’ की भूख, और जीवन का अंत। क्या हमारी पीढ़ी ने अपनी ज़िंदगी की क़ीमत इतनी कम कर दी है कि एक अदद ‘परफ़ेक्ट’ तस्वीर के लिए मौत को गले लगाने से भी नहीं कतराती? यह हादसा सिर्फ़ एक दुर्भाग्यपूर्ण चूक नहीं, यह एक ऐसा आइना है जिसमें हमारी पूरी समाज की विकृत प्राथमिकताएँ दिखती हैं।

आज की दुनिया में, जहाँ हर पल को कैमरे में क़ैद करने की होड़ लगी है, ऊँचाइयाँ अब आत्मविश्वास की नहीं, बल्कि ‘व्यूज़’ की गारंटी बन गई हैं। जोखिम उठाना अब बहादुरी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ‘ट्रेंड’ होने का पासपोर्ट है। बालकनी से झाँकना, चट्टान के किनारे खड़े होना, या चलती ट्रेन के सामने ‘पोज़’ देना—क्या ये सब उस खालीपन को भरने की कोशिशें हैं जो हमें अपने भीतर महसूस होता है?

यह सिर्फ़ बच्चों का खेल नहीं। यह एक पूरी व्यवस्था है जहाँ वास्तविक अनुभव से ज़्यादा उसकी डिजिटल प्रस्तुति मायने रखती है। अब हम किसी जगह की सुंदरता को आँखों से नहीं, बल्कि फ़ोन के लेंस से देखते हैं। हर यात्रा, हर भोजन, हर पल — एक ‘कॉन्टेन्ट’ है जिसे दुनिया को दिखाना है, भले ही इसके लिए ज़िंदगी को दाँव पर लगाना पड़े।

समाज, जो अपने युवाओं को ‘भविष्य’ कहता है, वह आँखें मूँदकर देखता रहता है कि कैसे वे अदृश्य दबावों के तले पिस रहे हैं। ‘फ़ोमो’ (FOMO - fear of missing out) और ‘जैलो’ (Jealousy - social media envy) के इस ज़हर ने उन्हें ऐसी अंधी दौड़ में धकेल दिया है जहाँ ‘लाइक’ और ‘कमेंट्स’ ही जीवन का पैमाना बन गए हैं। माँ-बाप, शिक्षक, और यहाँ तक कि नीति-निर्माता भी इस डिजिटल दलदल से निपटने की बजाय, या तो इसे अनदेखा करते हैं, या खुद इसमें गोते लगाते हैं।

यह कैसा विकास है जहाँ हमारे शहर की इमारतें तो आसमान छू रही हैं, लेकिन हमारे युवाओं का जीवन ज़मीन से भी नीचे गिर रहा है? सुरक्षा के नाम पर हम बड़े-बड़े दावे करते हैं, सीसीटीवी कैमरे लगाते हैं, लेकिन उस कैमरे के पीछे छुपी आत्मघाती मानसिकता को कब पहचानेंगे? क्या यह तंत्र का काम नहीं कि वह सिर्फ़ सड़कों पर सुरक्षा नहीं, बल्कि एक स्वस्थ मानसिक वातावरण भी प्रदान करे?

उस तेरहवीं मंज़िल से गिरे शरीर की तस्वीर शायद किसी ने नहीं ली होगी, या अगर ली भी होगी, तो उसे ‘शेयर’ करने की हिम्मत नहीं होगी। लेकिन उस ‘एक’ तस्वीर के लिए जिस पागलपन ने एक ज़िंदगी को लील लिया, उसका जवाब कौन देगा? क्या यह सिर्फ़ एक ‘एक्सीडेंट’ था, या हमारे डिजिटल-जमाने की सामूहिक चेतना पर एक गहरा घाव?

जब शहर अपने त्योहारों और रोडशो में मशगूल रहता है, तब उसकी आत्मा के भीतर एक ऐसा सन्नाटा पसर जाता है जहाँ एक नौजवान अपनी अंतिम साँस एक ‘सेल्फ़ी’ के नाम कर देता है। कल कोई और होगा, किसी और ऊँचाई पर, किसी और ‘पोज़’ के लिए। हम कब तक इस त्रासदी को सिर्फ़ एक ‘ख़बर’ मानकर पन्ने पलटते रहेंगे?

शायद जवाब की उम्मीद ही बेमानी है। हम सब अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त हैं, अगले ‘वायरल’ वीडियो की तलाश में। और जब तक यह सिलसिला जारी रहेगा, तेरहवीं मंज़िलें बस ऊँची होती जाएँगी, और उनसे गिरने वालों की संख्या भी। और हर गिरते शरीर के साथ, एक मौन ‘क्लिक’ की आवाज़ आती रहेगी।