जयपुर संपादकीय

लोकतंत्र का मतदान या मतदान का तमाशा

संपादक की राय

गुलाबी नगर में आज लोकतंत्र का ‘पर्व’ मनाया जा रहा था, और इस तथाकथित उत्सव का पहला दृश्य था एक रूठी हुई ईवीएम, जो अपनी मर्ज़ी से बटन दबने नहीं दे रही थी। लाखों मतदाताओं के लिए मताधिकार एक कागज़ की पर्ची और मशीन का ठप्पा है, लेकिन जब मशीन ही अपनी नियत भूमिका निभाने से इनकार कर दे, तो क्या यह ‘पर्व’ एक मज़ाक नहीं बन जाता? जब डिप्टी सीएम कैमरे के सामने ‘लोकतंत्र का उत्सव’ मनाते हुए अपना वोट डाल रहे थे, उसी वक़्त कहीं कोई नागरिक उस बेजान डिब्बे से जूझ रहा था, जिसे उसकी आवाज़ दर्ज करनी थी।

यह केवल एक मशीन का बिगड़ना नहीं है, यह उस भरोसे की टूट है जो हमारे नेता बड़े-बड़े मंचों से जनता में भरने का दावा करते हैं। जब ‘वैश्विक उदय’ की गाथाएं गाई जा रही हों, तब हमारे अपने शहर के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सबसे बुनियादी ईंट लड़खड़ा रही हो, तो क्या यह विडंबना नहीं? 18,000 से अधिक उम्मीदवार मैदान में हैं, अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन उनकी किस्मत का फैसला एक खराब मशीन और व्यवस्था की लापरवाही पर निर्भर हो, तो यह कौन सा चुनाव है?

फिर बात बारमेर से आती हिंसा की, जहां एक निर्दलीय प्रत्याशी का सिर फोड़ा गया। यह ‘मतदान का उत्सव’ था या खुलेआम गुंडागर्दी का प्रदर्शन? क्या हर चुनाव के साथ हिंसा और अराजकता का यह पैटर्न अब सामान्य मान लिया गया है? क्या मतदान केंद्र सिर्फ़ वोट डालने की जगह नहीं रहे, बल्कि सत्ता और रसूख के प्रदर्शन का अखाड़ा बन गए हैं, जहां हार-जीत से पहले खून-खराबा तय होता है?

यह कोई नई बात नहीं है। हर चुनाव में ऐसी इक्का-दुक्का खबरें आती हैं, और फिर उन्हें ‘छिटपुट घटना’ कहकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है। प्रशासन अपनी पीठ थपथपाता है कि चुनाव शांतिपूर्ण रहा, जबकि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। ये ‘छिटपुट घटनाएं’ ही तो लोकतंत्र की आत्मा पर गहरे ज़ख्म छोड़ जाती हैं, जिन्हें कोई आंकड़ा या बयान भर नहीं सकता।

जिस भजनलाल सरकार के लिए यह पहला बड़ा नगरीय चुनाव परीक्षण था, क्या यह उसका प्रदर्शन है? चुनाव को ‘लोकतंत्र का उत्सव’ बताने वाले क्या इस बात पर विचार करेंगे कि जब बैलेट ही नहीं डल रहा या वोट डालने वाले का सिर फूट रहा है, तो उस उत्सव का अर्थ क्या है? या यह सिर्फ़ बयानबाज़ी का एक और मौका था, जिसमें जनता की वास्तविक समस्याओं की कोई जगह नहीं?

इस सब के बाद भी, सत्ता के गलियारों में बैठे लोग, और टीवी के पर्दे पर चमकते विश्लेषक, चुनाव के हर पहलू को ‘लोकतंत्र की मज़बूती’ और ‘जनता की भागीदारी’ का प्रमाण बताएंगे। लेकिन ज़रा उस मतदाता से पूछिए, जिसने अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए एक खराब ईवीएम देखी, या उस उम्मीदवार से पूछिए जिसके संघर्ष का इनाम फूटा हुआ सिर था। उनके लिए यह ‘उत्सव’ क्या था?

क्या यह हमारे लोकतंत्र का वह चेहरा है, जिसे हम दुनिया के सामने गर्व से पेश करते हैं? एक तरफ चमक-धमक, बड़े-बड़े दावे, और दूसरी तरफ़ लड़खड़ाती मशीनें और लहूलुहान मतदाता। क्या हमारा लोकतंत्र सचमुच इतना सशक्त है कि वह ऐसी विसंगतियों को सिर्फ़ एक ‘छोटी सी चूक’ मानकर नज़रअंदाज़ कर सके? या यह उसकी कमजोरियों का एक कड़वा आईना है, जिसे हम देखना नहीं चाहते?