जयपुर संपादकीय

घर की लाशें और गुलाबी शहर की खुद्दारी

संपादक की राय

जयपुर की पहचान क्या है? हवामहल की जाली से छनकर आती धूप, शाही ठाठ-बाट, या फिर उस घर की सिसकियाँ जहाँ एक बाप ने अपनी पत्नी और तीन बेटियों को मौत के घाट उतार दिया? यह सवाल अब हवा में नहीं, बल्कि हमारी गुलाबी दीवारों में गूँज रहा है, जैसे किसी डरावनी कहानी का अधूरा अध्याय।

कर्ज़ और कलह, इन दो शब्दों को ढाल बनाकर हमने कितनी आसानी से चार लाशों को एक फाइल में बंद कर दिया। क्या यह सचमुच बस इतना ही था? क्या एक व्यक्ति का मन इतना खोखला हो सकता है कि वह अपने ही खून को पानी की तरह बहा दे, और हम इसे घरेलू विवाद का नाम देकर पल्ला झाड़ लें? या यह उस ‘गुलाबी नगरी’ की छिपी हुई बदरंग तस्वीर है, जहाँ चमक के नीचे अंधेरा इतना घना है कि चार ज़िंदगियाँ निगल जाता है?

हम यहाँ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, निवेश की, पर्यटन की, ‘स्मार्ट सिटी’ की। हमारे अखबारों के पन्ने मंत्रियों के बयानों और चुनावी वादों से अटे पड़े रहते हैं। लेकिन उस घर के अंदर क्या चल रहा था, जहाँ यह मौत का खेल रचा गया, इसकी खबर न समाज को लगी, न व्यवस्था को। क्या हमारी ‘प्रगति’ सिर्फ़ सड़कों और इमारतों तक सीमित है, और घरों की दीवारों के पीछे पनपते ज़हर से हमें कोई सरोकार नहीं?

यह सिर्फ़ एक परिवार का अंत नहीं है। यह उस नैतिक दिवालिएपन का प्रमाण है, जो एक समुदाय के रूप में हमें खोखला कर रहा है। जब एक बाप इतनी आसानी से हत्यारा बन जाए, और उसके पीछे की वजह सिर्फ़ ‘कर्ज़’ और ‘लड़ाई’ बताई जाए, तो समझना मुश्किल नहीं कि हमने कितनी गहरी खाई खोद ली है। क्या हमारी मानवीय संवेदनाएं सिर्फ़ हेडलाइंस की चमक तक ही सीमित हैं?

पुलिस अपनी जाँच करेगी, कागज़ पूरे किए जाएंगे, और कुछ दिन बाद यह खबर भी पुरानी हो जाएगी। लेकिन क्या कोई इस बात पर विचार करेगा कि किस तरह की मानसिकता इस समाज में जड़ें जमा रही है, जहाँ जान लेना इतना आसान हो गया है? या हम बस इसी तरह अगली त्रासदी का इंतज़ार करते रहेंगे, जब तक कि वह हमारे अपने दरवाज़े तक न पहुँच जाए?

हम ‘आधुनिक’ होने का ढोंग करते हैं, लेकिन हमारे भीतर आज भी वही आदिम हिंसक वृत्ति पल रही है। यह घटना सिर्फ़ एक घर का मातम नहीं, बल्कि पूरे समाज के चेहरे पर लगा एक ऐसा दाग है, जिसे कोई गुलाबी रंग धो नहीं पाएगा। इस शहर की आत्मा पर पड़ा यह गहरा घाव कब भरेगा, या फिर हम इसे भी अपनी चमकदार संस्कृति का एक ‘किस्सा’ मानकर भूल जाएंगे?