जयपुर संपादकीय — 13 September 2026
गुलाबी नगर में नशे की ‘डिजिटल डिलीवरी’
संपादक की राय
गुलाबी शहर, जहां कभी पान की दुकान पर मिलने वाले गपशप में भी एक तहज़ीब होती थी, अब वहां घर बैठे ‘मादक पदार्थ’ डिलीवर हो रहे हैं। कल्पना कीजिए, आपने कोई ऐप खोला, चंद बटन दबाए और ज़हर आपके दरवाज़े पर। यह किसी हॉलीवुड थ्रिलर का सीन नहीं, बल्कि हमारे जयपुर की ताज़ा हक़ीक़त है। क्या खूब तरक्की की है हमने कि अब गुनाहगारों को भी ‘लास्ट-माइल डिलीवरी’ की सुविधा समझ आ गई है?
कभी जो नशा छुपकर गली-मोहल्लों की अंधेरी कोनों में बिकता था, आज वह बड़ी शान से हमारे शहरों की डिजिटल सड़कों पर सरपट दौड़ रहा है। रैपिडो और पोर्टर जैसी सुविधाएं, जो कभी आम आदमी के लिए वक़्त और सहूलियत का पर्याय थीं, अब नशे के कारोबारियों की नई सवारी बन गई हैं। ‘डिजिटल इंडिया’ की इस नई परिभाषा पर किसे गर्व करना चाहिए, हमें या उन शातिर अपराधियों को?
और हमारी व्यवस्था? हमारे वो ‘जागरूक’ पुलिस अधिकारी, जिनकी साइबर सेलें बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, क्या उन्हें यह सब आभासी दुनिया का भ्रम लग रहा है? जब अपराधी इतने खुलेआम तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, तब हमारी खुफिया एजेंसियां किस सदी की ‘खुफिया जानकारी’ खंगाल रही हैं? या उनके पास ऐप चलाने की फुर्सत ही नहीं है, क्योंकि उनका ध्यान अब भी पुरानी अफीम की कोठियों में लगा है?
इस पूरे खेल का सबसे दिलचस्प किरदार है ‘मास्टरमाइंड आरडीएक्स’। यह नाम ही एक सड़े हुए व्यंग्य की तरह है — इतना फिल्मी और इतना क्रूर, फिर भी ‘अदृश्य’। ‘अदृश्य’ इसलिए क्योंकि या तो हमारे कानून के हाथ इतने छोटे पड़ गए हैं कि वे इस आभासी दुनिया में उसे पकड़ नहीं पा रहे, या फिर ‘आरडीएक्स’ इतना रसूखदार है कि उसे कोई देखना ही नहीं चाहता।
क्या यह हमारी सामाजिक उदासीनता नहीं है कि जब हमारे बच्चे, हमारे पड़ोसी, इन ‘डिजिटल ज़हर’ के शिकार हो रहे हैं, तब हम सिर्फ ख़बरें पढ़कर एक गहरी सांस भर लेते हैं और फिर अपने-अपने स्क्रीन में उलझ जाते हैं? क्या डिलीवरी बॉय सिर्फ पैसे कमाने का जरिया हैं या वे भी इस अपराध की अनजाने में ही सही, लेकिन एक कड़ी बन चुके हैं?
इस शहर की हर गली, हर चौराहे पर लगे सीसीटीवी कैमरे और हमारी ‘स्मार्ट सिटी’ का दावा, सब इस ‘अदृश्य आरडीएक्स’ के सामने बेबस मालूम पड़ते हैं। यह सिर्फ कुछ ड्रग तस्करों की बात नहीं, यह हमारे शहर के चरित्र पर लगा एक बदनुमा धब्बा है जो हमारी आधुनिकता की चमक के पीछे छुपकर पनप रहा है।
और अंत में, सवाल वही, जो हर ऐसी खबर के बाद मुंह बाए खड़ा हो जाता है: जब नशा इतनी आसानी से ‘ऑनलाइन’ उपलब्ध है, तो क्या इस शहर को सच में ‘गुलाबी’ कहा जा सकता है, या यह धीरे-धीरे नशे के ‘गुलाबी धुएं’ में खो रहा है? जवाब किसी के पास नहीं।