जयपुर संपादकीय — 14 September 2026
सेट परीक्षा: तीस मिनट की देरी, सालों का मातम
संपादक की राय
आज जयपुर के परीक्षा केंद्रों से जो तस्वीरें आई हैं, वे सिर्फ़ कुछ नाराज़ छात्रों के बाहर निकलने भर की नहीं थीं। वे उस व्यवस्था के खोखलेपन का दस्तावेज़ हैं, जो हर कुछ महीनों में अपनी अक्षमता का नया अध्याय लिखती है। राजस्थान राज्य पात्रता परीक्षा (SET) के उम्मीदवार, अपने भविष्य की आस लिए, तीस मिनट की मामूली देरी पर इम्तिहान छोड़ बाहर निकल आते हैं। मामूली? उनके लिए नहीं, जिनकी रातें किताबों में खपी हैं और जेबों में किराए के पैसे।
जिन युवाओं को राज्य की योग्यता प्रमाणित करनी थी, उन्हें पहले प्रणाली की अयोग्यता का सामना करना पड़ा। यह सिर्फ़ कागज़ के इंतज़ार में गुज़रे आधे घंटे का मसला नहीं, यह उन अनगिनत घंटों की अवहेलना है जो उन्होंने इन परीक्षाओं की तैयारी में लगाए। ‘सेट’ नाम का यह पात्रता परीक्षण, असल में सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक ढिलाई की पात्रता का प्रमाण पत्र बन गया है।
कोई नाम नहीं, कोई चेहरा नहीं। बस एक ‘व्यवस्था’ है, जो कभी पर्चे लीक करती है, कभी भर्तियाँ रोकती है, और कभी उम्मीदवारों को परीक्षा कक्ष से बाहर धकेल देती है। यह कौन से अदृश्य हाथ हैं जो परीक्षा के समय सारिणी से खिलवाड़ करते हैं? क्या इन तीस मिनट की देरी के पीछे कोई ऐसी गहन रणनीति थी, जिसे समझने के लिए उम्मीदवारों को उच्च योग्यता की आवश्यकता थी?
यह पहली बार नहीं है कि इस गुलाबी नगरी के युवाओं ने ऐसी बेचारगी महसूस की हो। पिछली बार क्या था? उससे पहले? तारीख़ें बदलती हैं, परीक्षाएँ बदलती हैं, लेकिन लापरवाहियों का सिलसिला जस का तस रहता है। हर बार एक नई माफ़ी, एक नया आश्वासन, और फिर वही पुरानी ढर्रे पर चलती हुई गाड़ी, जिसमें भविष्य सवार होते हैं और व्यवस्था के पहिए अपनी मर्ज़ी से चलते हैं।
परीक्षाएँ सिर्फ़ ज्ञान का मूल्यांकन नहीं होतीं; वे अनुशासन, निष्पक्षता और भरोसे की नींव पर खड़ी होती हैं। जब यह नींव ही हिल जाए, तो इमारत कितनी देर टिकेगी? इन छात्रों ने अपने घरों से, दूरदराज के गाँवों से आकर, उम्मीदों का बोझ ढोकर, सिर्फ़ एक मौक़े के लिए खुद को झोंका था। आज उन्हें मिला क्या? तीस मिनट का इंतज़ार और फिर अपने ही फैसलों पर शर्मिंदगी।
शायद यह देरी जानबूझकर की गई थी। एक अनौपचारिक योग्यता परीक्षण। जो छात्र तीस मिनट की देरी सह गए, वे भविष्य में सरकारी दफ़्तरों की सालों की देरी भी सह लेंगे। जो बाहर निकल आए, वे शायद इस प्रणाली के लिए ‘अयोग्य’ करार दिए जाएँगे—क्योंकि उन्होंने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया। यह तो बस पात्रता तय करने का नया, क्रूर तरीक़ा है।
इस घटना से क्या संदेश जाता है? कि कड़ी मेहनत सिर्फ़ तब तक मायने रखती है, जब तक व्यवस्था उसे कचरे के ढेर में न फेंक दे? कि परीक्षा केंद्र में प्रवेश करने से पहले, छात्रों को धैर्य की एक और ‘योग्यता परीक्षा’ पास करनी होगी? कि आपकी पढ़ाई, आपके सपने, सब उस अदृश्य अधिकारी की मर्जी पर निर्भर करते हैं, जिसने शायद आज सुबह देर से उठने का फ़ैसला किया था?
जयपुर में सूरज तो निकला, लेकिन परीक्षा केंद्रों से निकले छात्रों के चेहरों पर उसकी चमक नहीं थी। उनके लिए आज का दिन सिर्फ़ तीस मिनट की देरी का नहीं, बल्कि भविष्य पर छाए एक और काले बादल का था। और यह बादल अगले किसी इम्तिहान तक शायद यूँ ही मंडराता रहेगा।