जयपुर संपादकीय — 15 September 2026
ग्लिच या गिरोह? महापौर की कुर्सी का मोलभाव
संपादक की राय
जयपुर, जोधपुर और कोटा में महापौर चुनावों से ठीक पहले ईवीएम में “तकनीकी खराबी” की खबर क्या सिर्फ़ एक इत्तेफाक है, या हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का वह घिसा-पिटा नाटक, जो अब हर चुनाव के बाद मंचित होता है? जनता ने वोट दिए, नतीजे आए, लेकिन सत्ता का असली खेल तो अब शुरू हुआ है, जहां बहुमत साबित करने की जंग मशीनों से नहीं, बल्कि मनुष्यों की निष्ठा से लड़ी जाती है।
यह कैसी विडंबना है कि जैसे ही शहरी निकायों के चुनावी परिणाम आए और किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, “ईवीएम ग्लिच” की पुरानी रट फिर से सुनाई देने लगी। क्या ये मशीनें इतनी संवेदनशील हो गई हैं कि जैसे ही खरीद-फरोख्त की खुसर-पुसर शुरू होती है, ये खुद ब खुद काम करना बंद कर देती हैं? या यह किसी बड़े खेल की महज एक भूमिका है, जहाँ पर्दा डलते ही सौदेबाजी का बाजार गुलजार हो जाता है?
आम मतदाता ने अपना कीमती समय निकालकर, अपनी सारी उम्मीदें वोटों की पर्ची में समेटकर मतदान किया। उसे लगा था कि उसने अपने शहर का भाग्य लिख दिया। लेकिन यहाँ तो मतदान के बाद भी ‘मोलभाव’ की काली स्याही से फिर से भाग्य लिखा जाता है। महापौर की कुर्सी के लिए अब पार्षदों की गिनती उनके काम से नहीं, बल्कि उनकी कीमत से होगी।
“दल-बदल” और “घोड़ा-व्यापार” जैसे शब्द अब इतने सामान्य हो गए हैं कि वे खबर नहीं, खबर के बाद का अपेक्षित घटनाक्रम लगते हैं। जब खुलेआम ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हों कि बहुमत जुटाने के लिए पार्षदों की खरीद-फरोख्त होगी, तब उन ईवीएम की “खराबी” पर क्या कहा जाए, जो ठीक इसी नाजुक मोड़ पर ख़ामोश हो जाती हैं? ये तकनीकी बाधाएं नहीं, बल्कि राजनीतिक अवसर पैदा करने के बहाने लगते हैं।
गुलाबी नगर की गलियों में यह खेल नया नहीं है। हर बार, जब संख्या बल डगमगाता है, तो “नैतिकता” के सारे पाठ धरे रह जाते हैं। लोकतांत्रिक शुचिता की बातें करने वाले खुद सबसे पहले अपने खेमे में ‘नए चेहरे’ ढूंढने लगते हैं, चाहे वे ‘चेहरे’ कितनी भी कीमत पर क्यों न आए हों। जनता के जनादेश का गला घोंटकर, पर्दे के पीछे होने वाले ये समझौते अंततः शहर की मूलभूत सुविधाओं पर ही भारी पड़ते हैं।
क्या हमने अपनी सरकारों को ऐसे ही बनते देखा है? जहाँ जनता की पसंद महज एक सलाह हो, अंतिम फैसला तो राजनीतिक आकाओं और उनके धनबल का हो? सत्ता के गलियारों में अब तक ‘सेवा’ और ‘विकास’ की बातें सुनाई पड़ती थीं, पर अब तो ‘कीमत’ और ‘कमीशन’ की गूँज ज़्यादा तेज है।
फिर क्यों लाखों-करोड़ों रुपये चुनाव कराने में फूंक दिए जाते हैं? क्यों मतदाता को समझाया जाता है कि उसका एक-एक वोट महत्वपूर्ण है? जब आखिर में कुर्सी उसी को मिलती है, जो सबसे ऊंची बोली लगा सके या सबसे शातिर चाल चल सके, तो फिर यह पूरा तामझाम किस लिए? क्या यह लोकतंत्र का मखौल नहीं, तो और क्या है?