जयपुर संपादकीय

धोखे का व्यापार: एक नया भारत, पुरानी कला

संपादक की राय

शीर्षक: फ़र्ज़ी कॉल सेंटरों का जाल: डिजिटल ठगी का नया भारत

दिल्ली-जयपुर हाइवे पर चमकती गाड़ियों में, गुलाबी नगर की चौड़ी सड़कों पर घूमते युवाओं में और हर हाथ में झिलमिलाते स्मार्टफ़ोन में हमें एक नया भारत दिखाई देता है। लेकिन आज की ख़बर बताती है कि उसी नए भारत की धड़कनों के बीच एक और भारत सांस ले रहा है, जहां ‘आत्मनिर्भरता’ का अर्थ है चालाकी से डॉलर बटोरना और ‘डिजिटल क्रांति’ का मतलब है धोखे का एक ऐसा जाल बिछाना जिसमें कोई भी फंस जाए। पाटीदार, पुणे और चंडीगढ़ में फैले तीन फ़र्ज़ी कॉल सेंटरों पर छापा पड़ा, तो पता चला कि यह कोई छोटी-मोटी चोर-उचक्कों की मंडली नहीं, बल्कि संगठित अपराध का एक पूरा उद्योग है।

जिस देश को विश्वगुरु बनने का ख्वाब दिखाया जा रहा है, वहाँ सैकड़ों नौजवान ‘कॉल सेंटर एग्जीक्यूटिव’ बनकर उन विदेशियों को ठगने में लगे हैं, जिन्हें हम अपनी अर्थव्यवस्था का इंजन मानते हैं। ये सिर्फ़ कुछ फोन कॉल नहीं थे, बल्कि ‘झूठे बहाने’ और ‘लुभावनी बातों’ का एक ऐसा वेब था, जिसमें अमेरिका जैसे तथाकथित विकसित देश के नागरिक भी आसानी से फँस जाते हैं। क्या यह हमारी तकनीकी प्रगति का सबसे कुरूप चेहरा नहीं है?

सत्ता के गलियारों में बैठे लोग जब “स्किल इंडिया” और “डिजिटल इंडिया” का जाप करते हैं, तो क्या उन्हें इन तीन सेंटरों में काम कर रहे 220 लोगों की फ़ौज दिखाई नहीं देती? ये लोग किस ‘स्किल’ का प्रदर्शन कर रहे थे — झूठ बोलने की, भरोसा तोड़ने की, या तकनीक का दुरुपयोग करने की? और इस ‘डिजिटल भारत’ में ऐसे जालसाज़ी के धंधे पनपने के लिए कितनी ढिलाई या कितनी मिलीभगत की ज़रूरत पड़ती होगी, यह सवाल असहज कर देता है।

यह सिर्फ़ अमेरिका के नागरिकों को ठगने का मामला नहीं है, बल्कि हमारी अपनी नैतिकता, हमारी व्यवस्था की निगरानी और हमारे समाज के उस हिस्से पर एक तमाचा है जो हर कीमत पर ‘पैसा’ कमाना चाहता है। कौन हैं ये हर्षल रावल और रवि रामपी, जिनके नाम अब मास्टरमाइंड के तौर पर सामने आ रहे हैं? क्या वे सिर्फ़ दो मोहरे हैं, या उनके पीछे सत्ता और धंधे की मिलीभगत का कोई बड़ा खेल चल रहा है?

जयपुर जैसे गुलाबी शहर में भी ‘दोहरी ज़िंदगी’ कोई नया शब्द नहीं। यहाँ के महलनुमा घरों और शानो-शौकत के पीछे अक्सर काले धन और अनैतिक कमाई की कहानियां दबी होती हैं। तो जब चंडीगढ़ या पुणे में ऐसे फ़र्ज़ीवाड़े पकड़े जाते हैं, तो सवाल स्वाभाविक है कि हमारे अपने राजस्थान में, हमारी अपनी नाक के नीचे ऐसे कितने ही ‘कॉल सेंटर’ चुपचाप अपने जाल बुन रहे होंगे?

ईडी ने 66 मोबाइल फोन और 13 लैपटॉप ज़ब्त किए हैं। यह तो सिर्फ़ उस अपराध का छोटा सा भौतिक प्रमाण है, जिसे तकनीक के नाम पर अंजाम दिया जा रहा था। असली सवाल तो यह है कि इन अपराधों से अर्जित ‘संपत्ति’ का क्या हुआ? वह किन-किन हाथों से गुज़री और किस-किस की तिजोरियों में जाकर चमक रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे शहरी विकास और चकाचौंध के कुछ हिस्से ऐसे ही धोखे के व्यापार की बुनियाद पर खड़े हैं?

यह घटना एक चेतावनी है, कोई इत्तेफ़ाक नहीं। जब तक समाज में हर कीमत पर सफल होने की भूख और व्यवस्था में आँखें मूंद लेने की आदत बनी रहेगी, तब तक ऐसे ‘डिजिटल धोखे’ का व्यापार फलते-फूलते रहेंगे। हमारी नई पीढ़ी को कौन सा भारत विरासत में मिल रहा है — जहाँ ईमानदारी से पसीना बहाना सिखाया जाएगा, या जहाँ चालाकी से दूसरों की मेहनत हड़पना ही एकमात्र रास्ता होगा? इस सवाल का जवाब हमें ही खोजना होगा, या फिर एक दिन यह ‘वेब’ हमें ही अपनी गिरफ्त में ले लेगा।