जयपुर संपादकीय

काग़ज़ पर हज़ारों करोड़, ज़मीं पर सिर्फ़ एक फ्लाईओवर

संपादक की राय

एक हज़ार एक सौ करोड़ रुपए। यह मात्र एक संख्या नहीं, बल्कि एक सपना था। जयपुर के कथित भव्य भविष्य का, सुगम यातायात का, आधुनिकता की दौड़ में आगे निकलने का। और अब? अब यह एक मज़ाक है। एक ऐसा मज़ाक जो गुलाबी नगर की सड़कों पर धूल फाँकते हुए हर नागरिक को सुनाया जा रहा है।

केबीआर पार्क के लिए बना वह ‘मेगा ट्रैफिक प्लान’ अब सिर्फ़ एक फ्लाईओवर में सिमट गया है। ‘मेगा’ शब्द शायद इसलिए इस्तेमाल किया गया था ताकि घोषणा के समय तालियाँ अधिक बजें, या शायद इसलिए कि ‘प्लान’ बनाने वाले ख़ुद को कुछ बड़ा समझें। लेकिन असलियत में, यह ‘मेगा’ से ‘मिनी’ होने की कहानी, हमारी प्रशासनिक दक्षता का जीता-जागता प्रमाण है।

ज़रा सोचिए, एक हज़ार एक सौ करोड़ की योजना कागज़ पर कैसे उतरती है? क्या कोई विशेषज्ञ समिति बैठी होगी? क्या शहर के भविष्य पर गंभीर चिंतन हुआ होगा? या फिर किसी ‘दूरदृष्टि’ वाले बाबू ने वातानुकूलित कमरे में बैठकर बस एक बड़ा सा अंदाज़ा लगा दिया होगा, यह जानते हुए कि अंत में हिसाब कोई नहीं पूछेगा?

यह पैसा किसका था? किसी नेता की जेब से नहीं, किसी अफ़सर के वेतन से नहीं। यह जयपुर की उस जनता का पैसा था, जो अपनी मेहनत की कमाई से टैक्स भरती है, इस उम्मीद में कि उनका शहर बेहतर बनेगा। उनके सपनों पर ऐसे ‘प्लान’ का हश्र देखकर, क्या उन्हें अब भी ‘विकास’ के खोखले वादों पर भरोसा करना चाहिए?

योजनाओं का बनना, फिर उनका रद्दी की टोकरी में जाना, यह तो इस शहर की एक पुरानी रीत बन चुकी है। पहले एक भव्य चित्र बनाया जाता है, फिर उसकी रंगत फीकी पड़ती है और अंत में वह सिर्फ़ एक स्याह धब्बा बनकर रह जाता है। क्या यह सिर्फ़ ‘योजना’ की समस्या है, या योजनाकारों की मानसिकता की?

शहर की सड़कों पर वाहनों का रेला, धुआँ और शोर, ये आज भी वहीं के वहीं हैं। जिस समस्या का ‘मेगा प्लान’ से समाधान होना था, वह समस्या अब भी मुँह बाए खड़ी है। शायद अब अगला ‘मेगा प्लान’ इसी समस्या के ‘मेगा’ होने पर बनेगा, और फिर वही कहानी दोहराई जाएगी।

क्या वाकई किसी को परवाह है कि हज़ार करोड़ की योजना कैसे एक फ्लाईओवर में सिमट गई? उन अफ़सरों को, उन नेताओं को जिन्होंने इसकी आधारशिला रखी थी? लगता है, उनकी दुनिया में, ऐसी घोषणाएँ सिर्फ़ चुनावी मौसम की तरह आती-जाती हैं, और उनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं होता।

तो फिर सवाल यह है: क्या यह ‘योजना का रद्द होना’ मात्र एक प्रशासनिक विफलता है, या यह एक सोची-समझी चाल है, जहाँ पैसा लगाने और फिर उसे किनारे कर देने का खेल चलता रहता है? जब तक इस खेल के नियम नहीं बदलेंगे, जयपुर की सड़कें ऐसे ही ‘रद्द’ होती योजनाओं का बोझ ढोती रहेंगी। कोई जवाब देगा?