जयपुर संपादकीय — 19 September 2026
भरतपुर की ‘मनाई गई’ कुर्सी
संपादक की राय
भरतपुर में लोकतंत्र का क्या नया व्याकरण रचा गया है, जहां जीत के लिए प्रतिद्वंद्वी को “मनाना” ही पर्याप्त हो? चुनावी रणभूमि में एक प्रत्याशी का अचानक हथियार डाल देना, क्या यह खेल भावना की पराकाष्ठा है या खुलेआम नियम तोड़ने की नई कला? विचित्र सिंह ने नामांकन वापस लिया और भाजपा की अनुराधा सिंह महापौर बन गईं – वाह! इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की खूबसूरती कहें या सत्ता के खेल का नग्न प्रदर्शन, यह गुलाबी नगर की चौपालों पर चर्चा का विषय बन चुका है।
यह ‘मनाई गई’ जीत, जिसे कुछ लोग राजनीतिक सूझबूझ कहेंगे और कुछ परिवार की आपत्तियां, दरअसल हमारे उस ‘लोकतंत्र’ के मुंह पर एक करारा तमाचा है, जो अभी भी ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ के गीत गाता फिरता है। क्या ‘मनाना’ अब धमकी का नया नाम है? क्या यह डर का दूसरा रूप है? या फिर ‘सौदा’ का एक शिष्ट पर्याय, जिसे कागजों पर शालीनता का लिबास पहना दिया गया है?
विचित्र सिंह के परिवार का चीख-चीख कर कहना कि उन पर दबाव डाला गया, भाजपा द्वारा ‘मजबूर’ किया गया, क्या यह सिर्फ एक असंतुष्ट पक्ष का प्रलाप है? या फिर यह उस स्याह सच की प्रतिध्वनि है, जो सत्ता के गलियारों में सरेआम गूंजता है लेकिन जिस पर कान देने की फुर्सत किसी को नहीं? जब एक स्वतंत्र उम्मीदवार, जो चुनाव लड़ने का माद्दा रखता हो, एकाएक मैदान छोड़ दे, तो सवाल तो उठेंगे ही।
यह कैसी लोकतांत्रिक जीत है जहाँ मतदाता की पसंद, उसके संघर्ष, उसकी उम्मीदों को एक झटके में कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है? जब चुनाव से पहले ही परिणाम तय हो जाएं, जब चुनावी प्रक्रिया महज एक औपचारिकता बनकर रह जाए, तो फिर यह पूरा नाटक करने की ज़रूरत ही क्या है? सीधे-सीधे सत्ताधारी दल को ही कुर्सी सौंप क्यों नहीं देते?
गुलाबी नगरी के बाशिंदे, जो कभी चुनावी उत्सव में अपनी भागीदारी महसूस करते थे, अब इस तरह के तमाशे देखकर सिर्फ ठंडी सांस भरते हैं। उन्हें पता है कि यह भरतपुर का अकेला मामला नहीं है। यह तो एक प्रवृत्ति का हिस्सा है, एक ऐसा बदरंग अध्याय है जो हर चुनाव में नए पन्नों के साथ जुड़ता चला जाता है। राजनीतिक दल अपनी नैतिकताओं को गिरवी रखकर सिर्फ कुर्सी साधने में लगे हैं, और हम तमाशबीन बने हैं।
चुनाव आयोग, जो लोकतंत्र का प्रहरी बनने का दावा करता है, ऐसे मामलों में अपनी चुप्पी क्यों साधे रखता है? क्या उसकी भूमिका सिर्फ तारीखें घोषित करने और वोट डलवाने तक ही सीमित है? जब खुलेआम धांधली की बू आने लगे, जब ‘दबाव’ और ‘प्रलोभन’ की बातें हवा में तैरने लगें, तब उसकी ज़िम्मेदारी क्या सिर्फ “हमें कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली” कहकर खत्म हो जाती है?
यह भरतपुर की घटना महज एक महापौर पद की लड़ाई नहीं थी। यह उस विश्वास की हत्या थी, जो जनता को अपनी पसंद चुनने के अधिकार में होता है। यह उस व्यवस्था की पोल खोलती है, जहाँ चुनाव को खेल के मैदान की तरह नहीं, बल्कि शतरंज की बिसात की तरह देखा जाता है, जहाँ मोहरों को खरीदकर या डराकर रास्ते से हटा दिया जाता है। क्या वाकई अब यही हमारी लोकतांत्रिक नियति है?